C January to June 2025

 कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,

दो-चार पैसे जुड़े थे, कुछ हिम्मत सी आई थी, थोड़ा विश्वास सा था।
पर इंसान हूं, बच्चों की ज़िद, बीवी के ख़्वाब में मेरा मन नई कार का था।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ऋण को थोड़ा, घाव को छोटा, क्रोध को तनिक और कसाय को अल्प।
कम समझने की गलती ना करें आप फंस जाओगे देखे कितने कल्प।।

 

 

कल शाम मुक्कड़बपर बुद्ध मिले कहते थे,
अर्थशास्त्र का नियम रहा है होता मांग के अनुसार पूर्ति।
विज्ञापन का अर्थ है मांग के अनुसार बनी रहे आपूर्ति।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जिज्ञासा बुद्धि में खुजलाहट जैसी है बैचेन रखें।
प्रश्न और उत्तरें में खोए तुमने कितने स्वाद चखें।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कब्र चीखती हैं, शमशान में आवाज़ है, अब गटर भी बोलते हैं।
पत्रकार मरने के बाद भी कैसे हुक़ूमत की कलई खोलते हैं।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ऊल-जलूल भौंक के सड़क चिकना बनाएगी।
औरतों, दलितों और मुसलमानो को कितना सताएगी।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मिसोजिनी, पितृसत्तात्मक, पैट्रीयार्की या कहिए मर्दवाद।
इनकी गंदी नज़रों की पहनावे पर गिरती ही है मवाद।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लुटना वो नहीं है जिसमे आप अनजाने में मूर्ख बन जाएं।
लुटना उसे कहते हैं जिसे होने के बाद आप समझ पाएं।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मुहब्बत एक बार होगी बार बार नहीं।
आदत सिर्फ़ हवस की है इश्क नहीं।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बीती रात को जलती लकड़ियों को देख याद आया।
तह राख की नहीं मिलती कौन पहले कौन बाद आया।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
तकल्लुफ़ अब नहीं बाक़ी रहा की बात मौखिक हो।
लिखित दस्तावेज़ रखिए जहां हर बात मौलिक हो।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
परवाज़ सिर्फ़ उड़ने से है तो चलो किस नाम का परिंदा लोगे।
ज़मी पर हार मेरी देख के तुम अपनी जीत पर शर्मिंदा होगे।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ये जैकब ईश्वर से लड़ गया फ़िर कर हार स्वीकार।
जैकब से इज़राइल हो गया कैसा नाम अधिकार।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने षडयंत्र सनातन धर्म के आयोजन में बुना था।
कुंभ महा कब हुआ अब तक कुंभ और अर्धकुंभ सुना था।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धर्म धारण की शैली है प्रदर्शन की नहीं।
मंदिर मस्ज़िद में खोए अंतर्मन में नहीं।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बाज़ार में आएं हैं नए बाबा और बाबियां, चलो देखने चलें।
धर्म जो अध्यात्मक था अब हुआ प्रदर्शन, चलो देखने चलें।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दिन 26 के भाषण में "उनकी कम्युनिटी की गलती" बता देना।
ज़हमत बताने की ज़रा करिए कि कैसे इसमें भी गलती हमारी है।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बस्ती में बुल्डोजर कुछ चुने लोगों के मकां ढहा रहा है।
वही आज मेले में बुल्डोजर लाशों के साक्ष्य हटा रहा है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बेशर्म मोक्ष कहता था कोविड से मरे लोगों के लिए।
वो आज भी ये बात दोहरा रहा है भगदड़ के लिए।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
उर्वशी, रंभा या मेनका और महिलाओं को अप्सरा कहना।
ऋषियों की हवस भड़ास से निकल वेदों में दर्ज़ होती रही।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत को दिखावे के लिए संख्या दुगनी चाहिए।
भूल गए पानी, हवा और भीड़ रुकनी नहीं चाहिए।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कुछ अर्ज़ीयां मेरी भी ख़ुदा के पास थी सुलझाने को।
मौलवी,मुफ़्ती, उलेमा, हाफ़िज़, इमाम उलझाते रहे।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
महामंडलेश्वर बनाओ साधु बनाओ ये प्रांगण तुम्हार।
बिन मेहनत झूठी कहानियां गढ़ करे ब्रह्मण गुज़ारा।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अकबर पहले के जन्म में मुकुंद नाम का ब्राह्मण था।
चाटुकारिता कर भविष्य पुराण में ये ही लिख दिया।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ब्रह्मा के अणुओं में है जो कहने लिखने का सलीक़ा।
शोषण, झूठ और षडयंत्र में सोच रखने का नतीज़ा।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गैरत भी नहीं पंडो के गिरने में हमे हैरत भी नहीं थी।
भगदड़ से मोक्ष मिलता और कहें ये मानव बलि थी।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ना भक्ति ना भजन ना भोग ना एक भगवान चाहिए।
इस इश्क़ की ग़ज़ल में क़ाफ़िया भी अनजान चाहिए।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
तर्क सिर्फ़ बे-पेंदी का लौटा या मान ले तर्क को वैश्या।
तर्क नपुंसक है यहां कपटी भी ख़ुद को समझे कन्हैया।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जयशंकर है विदेश मंत्री क्या समझे इज्ज़त क्या है।
भारत लोकतंत्र के संसद में बोलें ये मजबूर बयां है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बुलबुले फूटते हैं हुक़ूमती नकलची कभी टिक नहीं पाते।
सच पर टिके रहना अरविंद इतना मुश्किल भी नहीं था।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हार भी हार नहीं होती अगर मानो मत।
सफ़र अभी और है चलो फ़िर से चलें।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बागड़बिल्ला, गीदड़, सियार दिखाऊंगा तब होगा विश्वास।
कुमार नाम की एक दोगली संगत का ख़त्म हुआ निर्वास।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कुंभ में दर्शन है, तथ्य है, तत्व है और तर्कों के बिना भीड़ है।
सभी इंसान है संगम के तट पर नहीं किसी VIP की नीड है।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
आस्था सिर्फ़ तब तक ठीक है जब तक प्रदर्शित ना हो।
बीमारी का इलाज़ आसान है अगर वो संक्रमित ना हो।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मन की उलझने को सुलझाने के लिए प्रश्न करें।
छोड़िए मोक्ष, स्वर्ग, हूरें, बाइबल चलो जश्न करें।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने संसाधन झोंक दिए सिर्फ़ नहाने के लिए।
स्कूल में गांव के आज भी पानी पीने का नही आया।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कहानियां गंगा की है शरीर धोने प्रकट हुई कैलास से।
गंगा मन चंगा करने के लिए आई कठौती में रैदास के।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मंत्रोचारण के साथ पेशाब और पैखाने से पवित्र कर दिया।
ब्रह्मा के अणुओं ने प्यासा मारने को क्या कुछ नहीं किया।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पदार्थ का विज्ञान एक है फ़िर चैतन्य के अनेक कैसे।
विश्व में इंसान तो एक हैं फिर धर्म बने अनेक कैसे।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मुंतशिर, इलाहाबादिया या क़ाफ़िया जोड़ लीजिए ख़ान का।
कथित हिंदुओं को ही सिर्फ़ सहारा है मुस्लिम पहचान का।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अश्लील फ़ूहड़ ढूंढता था अपनी मां में अपना भूर्ण।
तरफ़दारी में इलाहाबादियां के खड़ा छोटा चंद्रचूर्ण ।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने दिन चुन-चुन षड्यंत्र से बदनाम कर दिए।
6
दिसंबर को विध्वंस 14 फरवरी को प्राण हर लिए।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धर्म की आड़ लिए हुड़दंगियों ने हत्याओं पर जश्न मनाया है।
होली, दशहरा, गीता देख हमने कथाओं पर प्रश्न उठाया है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत के पक्ष में नहाने के उपलक्ष में 100 करोड़ आएंगे।
फ़ेकल कोलीफ़ॉर्म तो क्या ये आस्था में पैशाब पी जाएंगे।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हॉस्पिस और हॉस्पिटल में एक फ़र्क साफ़ है।
मरना तो सभी को है एक कोशिश ख़िलाफ़ है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
110%
से 15% घटा मस्क के आगे डर के मस्तक झुका लिया।
देसी कार बनाने वालों के लिए ई कार का मार्किट सुखा दिया।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कैंसर बीमारी का हल नहीं अभी सभी रिसर्च सेंटर हैं।
हर पल उलझती कोशिका बायोस्पी का कौन मैंटर है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत के इस नए दौर में कुछ भी ना समझ मैं पाता हूं।
चपरासी 9.30 दफ्तर पहुंचता है मैं 8.30 पहुंच जाता हूं।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वर पक्ष में असावरी,काले वर्ण, राक्षस का शिव बारात में ज़िक्र है।
दलित हैं और गौर वर्ण वाले वधू पक्ष को मंगलाचार का फ़िक्र है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कई द्विज बूढ़ों ने बुढ़ापे में अपनी हवस को शांत किया है।
डगमग-डगमग नाड़ हिला ख़ुद को शिवबाबा मान लिया है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मैंक्रो ने ट्रंप को रोक दिया ग़लत बोलते हाथ लगाकर।
विश्वगुरु आए सुन-सुनवाकर हथकड़ियां लगवाकर।।

 

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अकेलापन काटता है बैचेन हैं ये आंखे, दिल उदास है।
फेसबुक पर पांच हजार पर घर पर ना कोई पास है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दिन पांच बाद इन्हें चौराहे पर होलिका जलानी है।
पूरे साल में सिर्फ़ आज ही इनको रस्में निभानी हैं।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गौमूत्र और अंजीर में एक ही बीमारी से शफ़ा थी।
सिर्फ़ बैठ के धर्म पर बकते थे उन्हें सीर बवा थी।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कोठे ऊपर कोठरी वा पे परमानंद में भी संस्कृति देखते।
मुसलमानों को कोसते ब्रज में परिवार की दुष्कृति देखते।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने मस्ज़िदों को ढक जाल षडयंत्र का बुना है।
"
वसुधैव कुटुंबकम्" अब ख़ालिस नारा बन चुका है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अतीत के बल के बिना मज़ाल क्या है जो नई बात करे।
मेरी भी गत है सुना है गैलीलियों ने भी ऐसी बात कही।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धर्म के नाम पर कितनी हत्याएं, बलात्कार, डकैती हुई हैं।
मिस्टर गांधी हरिजनों के मंदिर प्रवेश कराते लठैत धुरी हैं।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कोहिनूर या रत्न दो कौड़ी के नहीं क्या खाओगे या कोई इलाज है।
समाज में जो मुश्किल से मिले उसी को अमीर कहने का रिवाज़ है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे
ख़ुसरों ने उर्दू में लिख दिया नायक, नायिका, तीज सब हिंदू।
आज बन भक्त लड़ने को आमादा जिन्हें कहा खीज में सिंधु।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पत्थर जोड़ के रंग पोत के महल किया खड़ा।
वो ही जाकर जलवा देंगें जिनके लिए लड़ा।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
एक बड़े जज साहेब के घर ढेर नोटो का मिला।
मोर मोरनी को देता है अपने आंसुओं को पिला।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गुरु की आस लिए घूमे तीर्थ, पथ और धाम।
अशोक बन जाते तुम जो लेते मुझ को थाम।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
माननीय के धंधे पकड़े अब रिकवरी मेमो पर बाते जारी।
निजी अंग पकड़े, नाड़ा तोड़ा कहे गलती नहीं निशानी।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वकीलों का धंधा मंदा है ये जज सीधे पैसे ले रहा है।
बंगले में हर जलता नोट नाम मुंसिफ़ का ले रहा है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
आग भी है, धुंआ भी है, कमेटी भी है, नज़र भी है और भभूत भी है।
ना FIR, ना सीजर रिपोर्ट, वीडियो को छोड़कर ना कोई सबुत ही है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गरम खूं की कहानियां झूठी भी हों फ़िर भी सही लगती है।
लूटने को एक साहूकार की जैसे एक-तरफ़ा बही लगती है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
आज लोकतांत्रिक चुनाव में लड़ने की बात पुरानी है।
लड़ने की बजाए चुनाव प्रबंधन कर आवाम चुरानी है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पहले हुआ करते थे ये पत्रकार एक मिशन पर।
आज चलता है घर उनका सिर्फ़ कमीशन पर।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ना मेगास्थनीज़ की इंडिका में और ना ही किसी अभिलेख में।
चाणक्य का झूठा चरित्र गढ़ा गया है मनुवादियों की देखरेख में।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धर्म में छोटी साल की विधवा को मरे पति की चिता से ज़बरदस्ती बांध दो।
या सभा में नशा दो, बाल खींच हवसी मर्दों की बैठने के लिए जांघ लो।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
तीर्थंकाओं ने नालंदा जलाया तुर्क और ख़िलजी ने नहीं।
अब तीर्थंका कौन थे तुम्हे ये वाट्सएप पर मिलेगा नहीं।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धर्म अशोक बन गया कुरूप चण्ड अशोक।
बुद्ध ने बदला भारत प्रत्यक्ष या फ़िर परोक्ष।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
औरत पसंद हैं देखने को, बात को, छूने को मर्द रहते आकांक्षी।
पर इस पितृसत्तात्मक समाज में नहीं देते औरत को आज़ादी।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इंसा की समझ तैयार करने में इन्कलाब चाहिए।
धब्बों को धोने में धर्म की और बरसात चाहिए।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अर्थशास्त्र भारत या अमेरिका में क्या बचा बताने को।
ख़ुद आवाम ने ही व्यापारी को चुना मुल्क चलाने को।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शर्बत जिहाद जैसी शैली व्यापारियों में हरगिज़ ठीक नहीं।
रूह अफ़ज़ा से अच्छा और सस्ता बनाओ सिर्फ़ डींग नहीं।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चौबीस के चौबीस तीर्थंकर क्षत्रिय और मानने वाले वैश्य।
संप्रदाय ने जिओ और जीने दो का धारण किया है धैर्य।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत से ख़िलाफत और बग़ावत कोई अपराध नहीं।
चुप रह कर सहते रहने से कहीं ठीक है गर्म संवाद रहे।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत से ख़िलाफत और बग़ावत कोई अपराध नहीं।
चुप रह कर सहते रहने से कहीं ठीक है गर्म संवाद रहे।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जिसके पास धन हो वो खड़केगा ही।
बिना रीढ़ के सुन कर वो भड़केगा ही।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
तुम मूत दो सिर पर फ़िर हमें पिछले जन्मों का ज्ञान पिलाएं।
और तुम चाहते हो फूले जैसी फिल्मों में भी हम ना दिखाएं।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अभी कव्वे गिन रहें है इसके बाद सितारें अंतिम में गिनेंगे।
बुद्ध की निशानियों को कुझिल जैसे ASI हिन्दू ही कहेंगे।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
समिति मनुस्मृति कहे शूद्र के कान में डाले पिघला शीशा चूर्ण।
पुष्यमित्र शुंग काल में गढ़ा जो था केवल सौ-दौसौ ईसा पूर्व।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ब्रह्मा के अणुओं में हर समय खूं सवार रहता है।
फरसे से हत्या कर देगा ये जिसको मां कहता है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
आतंकवादियों और मनुवादियों में फ़र्क फ़कत बस इतना है।
एक धर्म पूछ रहा दूसरा कहे ना स्तन ढकने का हक़ इनका है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अवतार से अर्थ है उस पार से इस पार आए।
तीर्थंकर वो है जो इस पार से उस पार जाए।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
प्रार्थना ने दूसरा चाहिए ध्यान में केवल एक।
हिंदू से ज़्यादा मौलिक है बुद्ध धर्म का टेक।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत और सियासदानों के लोगों का ज़्यादातर अंदाज़ है।
आवाम सोचे बारापूला भूलें देखिए पहलगाम का क्या अंजाम है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नोट में चिप और पेड़ो की खोह में आतंकवादी छिपाएंगे।
गोदी मीडिया वाले हुक़ूमत को बचाने क्या कुछ दिखाएंगे।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नए दौर में जमात IAS की जमात IPS के पीछे रह गई।
उत्तर प्रदेश में कलम न्याय की डंडे से नीचे रह गई।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
भक्त परेश आत्मनिर्भरता की अब ज़िंदगी जीता है।
नए ज़माने में गाय के बजाए ख़ुद का मूत पीता है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बुद्धि में ज्ञान की, विवेक की और बुद्ध की तक़रीर रहें।
आइए भारत राष्ट्र के शीर्ष राज्य संस्कृतिक काश्मीर चलें।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत के डर से लिखे-पढ़े में भी द्वंध रहे।
गुड-बुक में आतुर हैं ये खोपड़ी से मंद रहें।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत की कोशिशों में आगाज़ कहीं ज़रूर।
दल बदलने वालों में नया संभ्रांत शशि थरूर।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत आंकड़ों के खेल में ग़रीबी छिपा लेती है।
सैंपल के तरीक़े बदल ख़ुद अमीरी दिखा देती है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बिन तुग़लक़ ज़िंदा है कारनामे देखते रहिए l
ग़लत को ग़लत जनाब ये आप मत कहिए।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ज़बान टूटती ही नहीं नाम लेने से।
कड़ी निंदा से फ़कत काम लेते ये।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अरहत या थेरवाद रहे जो कहलाते हीनयान।
महायान बन गए भारत के प्रथम शिल्पकार।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
औरत को दबा लेने को हवस दिखाती है हर जगह।
व्योमिका और सोफिया को माने शख्सियत बेवजह।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अध्ययन आकाश का था धर्म में उसे ज्योतिष कह दिया।
प्रकृति की गतिविधियों को स्वार्थ में पोषित कर लिया।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत की देखरेख में मुल्क बंट गया।
धर्म जाति पंथ में भारतवासी कट गया।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ज़िक्र दौड़ने का रगों में उठाया है ग़ालिब के बाद।
जुमलों की बारिश है साहेब की जानिब से आज।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर युद्ध मिले कहते थे,
घड़ी हर घर में है समय दर्ज़ है रोज़मर्रा के काम में।
फ़िर अज़ान के लिए लाउडस्पीकर की ज़रूरत क्या।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पश्चाताप करने के लिए नहीं कभी तैयार हूं।
बलि कह गला काटते कहते सिर्फ शृंगार है।।

 

कल शाम।नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक्मरान सिंदूर बांटने में भी अक्ल से सोचता नहीं।
छेड़ने की महिलाओं को घर-घर अब योजना बनी।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिकीले कहते थे,
एक कुंठित नए बौद्ध भिक्षु को लाया गया सामने मेरे।
विपश्यना करने से पहले ही किताबें छानने निकला।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कल्पवृक्ष, कामधेनु या स्वर्ग सिर्फ़ काम से पीड़ित लोगों की मनौती हैं।
इसी तरह के लोग इस समाज, सोच या धर्म पर मानवता की पनौती है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पहाड़ों के जंगलों में आग लगाता है ये आदमी अब भी।
जिम्मेदारी डाल देता है सूरज पर, प्रकृति पर सब की।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत पहाड़ों कोे छेदे चली जा रही है सिर्फ़ एक हवस में।
नेता जी उत्तराखंड के बीमार हैं रोज़ उद्घाटन की तलफ़ के।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ग़ुलाब देना मुहब्बत की निशानी नहीं तो क्या कीजिए।
इश्क़ है अगर आपको किसी से तो सिर्फ़ वक्त दीजिए।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत के दस्तरखां पर लल्लनटॉप भी बिना रीढ़ का था।
सड़े दरख़्त एकएक कर गिरते गए ये वाला चीड़ का था।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सड़क पर पुरानी साल दस कार चल नहीं सकती।
साल ग्यारह पुरानी चील गाड़ी कैसे आस्मां में थी।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
"
विचार" में जीना जैसे नर्क में पड़े दुःख पाओगे।
"
भाव" में अगर जीते हैं तो सीधा स्वर्ग लाओगे।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मिलता उसी को है जो इंसान मांगता नहीं।
ये इंसान सदियों से यह बात जानता नहीं।।

 

कल शाम नुक्कड पर बुद्ध मिले कहते थे,
मिर्ची नींबू लटकाने की राफेल पर हरकते याद हैं।
तकनीक बनाने और उड़ाने की तो ये जानते नहीं।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कहानी में बर्बरीक का गला काट के कृष्ण ने ऊंचे पर रख दिया।
शामिल ना पक्ष में ना विपक्ष में वो पराजय हर गली कूचे चख लिया।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
खिल्ली उड़ रही है भक्ति का एक जाम पीला दे।
टुच्चे से मुल्क का कोई राष्ट्रीय सम्मान दिला दे।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इज़रायल या ईरान में आज कौन किसके साथ है।
फिलिस्तीन भी एक देश था क्या तुमको याद है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नया भारत तटस्थ जो सकता है पर उसे निष्पक्ष तो होना होगा।
युद्ध के दौर में वजूद दिखाने को ग़लत को ग़लत कहना होगा।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लीलाधर से की गद्दारी अटलबिहारी अंग्रेज़ों को लिख गवाही देई।
इनमें सिर्फ़ एक ही सच्चा क्रांतिकारी था पर थे दोनों वाजपेई।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जाति पूछी धर्म नहीं ले भीड़ ब्राह्मअंड ने काट दिए सर के बाल।
पेशाब से "पवित्र" किया फ़िर रगड़वाई कथावाचक "यादव" की नाक।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पढ़िए, शिक्षित बनिए ये झूठ बोल कथावाचक क्या बनना।
तर्क, बुद्धि, ज्ञान छोड़ किसी धर्म की वकालत क्या करना।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मैंने सूरज से पूछा कि भाई ये अंधेरा क्या है
वो तो तमतमा के कहने लगा ये झूठा बयां है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मौत हर एक धर्म के उपजने की पहली दशा है।
दार्शनिक एक कहता था ये सिर्फ़ एक नशा है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत की ज़बान में झूठ, तानाशाही और ज़हर है।
दिल्ली आईए ये यमुना के किनारे एक सुंदर शहर है।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
उसे मालूम ही नहीं है वो एक अब मुख्यमंत्री है।
अक्ल बाज़ार में मिलती है तो उसे भाव बता दो।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
किसी मंत्रालय पर मंत्री जी का कुछ नहीं था ज़्यादा कंट्रोल।
ईरान तो विदेशी है पर ईरानी करे मुल्क में विपक्ष को ट्रोल।।

 

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ब्राह्मअंड शूद्रों को भगवान भी कहेगा और संत भी बोलेगा।
खबरदार जो धंधे में धर्म के घुसे तो शूद्रों पर मूत भी ये देगा।।

 

 

 

 

 

 


टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट