B July to December 2024

 कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,

बालबुद्धि फ़िर ही ठीक है बनिस्बत बुद्धिहीन के।
सभाएं दोनों में छमता पूरी पर ये हैं भूमिहीन से।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इकोसिस्टम को धमकाते पंचायत में प्रधान।
ठोकते सरकारी महकमे लखनवी सलाम।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शोले की मौसी ही नहीं हमें एक गब्बर भी याद है।
किसी डकैत का परिवार साथ हमेशा नहीं रहता।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
एक शैडो मंत्रिमंडल बना दीजिए।
शैडो शिक्षामंत्री से जबां लीजिए।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सेठ के यहां शादी है शैडो मंत्रिमंडल से उम्मीद लगाएं रखें।
तेरी ही जेब से निकलेगा खर्च बाज़ार पर नज़र जमाएं रखें।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सामाजिक व्यवस्था या आर्थिक ढांचे में दमन दुःख का कारण।
मार्क्स, फ्रायड, लेनिन, माओ भी नहीं कर पाते बुद्ध को धारण।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मैं खाऊं तो भोग करूं, स्नान करू श्रृंगार, घूमूं तो परिक्रमा।
खुदा, भगवान सब मैं ही हूं क्या फ़िक्र किसी की प्रतिक्रिया।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
झोला झंडा लेकर आता शहरी पर्यटक पहाड़ों की छांव में।
विस्की सिगरेट और प्लास्टिक लाता खुश होने के चाव में।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धार्मिक तो हूं पर मैं बिल्कुल सांप्रदायिक नहीं।
आप समुदाय में रहे पर सोच सामुदायिक रही।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नज़ला है, बीमार है और गर्मी से भगवान भी परेशान रहते हैं।
एयरकंडीशनर दान देंगे पर नाम लिखें, यह जजमान कहते हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक्मरान नए नोट कब तक बदल पाते हैं।
ज़रा सा बारिश में क्या भीगे फट जाते हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
प्राश्चित का अर्थ कतई नहीं है प्रश्चाताप करना।
मनु ने इसी तरह दंड का नाम संहित रक्खा था।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दावा था कि स्पेस टेक्नोलॉजी से सड़क बन रही है।
तोहमत अब लगा रहें है कि ये है शरारत किसी की।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत चिल्ला के कहती है गरीबों के शौचालय।
अमीरों के लिए चुपचाप सचिवालय तैयार करती है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
"तारीख़ पर तारीख़" एक जुमला फिल्मी था।
नज़र में हमारी एक ही मुंसिफ़ तो इल्मी था।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत का जमाई बनने की ख्वाइश रखता है।
कच्छे में घूमता था आज पेपर लीक करता है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ज़िक्र दिल्ली में पेड़ों की गैरकानूनी कटाई का होगा।
किसी गवर्नर ने एक कचहरी के आदेश को था रोका।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत की सोच में आज धर्म, जाति सेंगोल और भागवत था।
आपातकाल ग़लत था लेकिन वह संविधान के मातहत था।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
संविधान हत्या दिवस ना कह कर संविधान निलंबन कहिए।
अमर बाबा साहेब आंबेडकर के प्रयास को आप चिरंतन रखिए।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
उसूल अर्थ का है कि आम लोगों के पास बाज़ार में पैसा रहें।
लाला ही सब रख लेता मज़दूर आवश्कता में खर्च कैसे करें।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत खूं ख़राबे, क़त्ल, सांप्रदायिक दंगे, रक्तपात,पितृसत्ता करती है।
दलित, महिलाओं, मज़दूरों के हक़ लिए संविधान हत्या की बात करती है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
थूक का चाटने में प्रधान सेवक का नाम हो गया।
सेठ का माल भरने में टेम्पो एक बदनाम हो गया।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मार्क्स जिसे अफ़ीम समझता वो जैसे धारण का गीत।
धर्म गरीब के लिए सांत्वना है अमीर के लिए संगीत।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अगड़े ही लेखनी से साहित्यकार पवित्र कहे गए।
पिछड़े तो सिर्फ़ इनके साहित्य के चरित्र रह गए।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत रेहड़ी वालों को लेकर जारी करे आदेश की पाति।
ये धर्म की अभी पहचान करेगी पहले फ़िर बाद में जाति।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जमुरे सारे बुला कर वो दिखाना क्या चाहता था।
पैसा दिखाने की लत में क्या जताना चाहता था।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बेचने का हुनर है उसे सिर्फ़ पैसा कमाना है।
शादी ही नहीं मौत में भी मजमा लगाना है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कांवड़ बनाते हैं, केदारनाथ में पिट्ठू उठाते हैं।
गंगा-जमुनी तहज़ीब में मीठे फल खिलाते हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कथावाचक जो सब बैठ कर धर्म बांचते हैं।
श्रोता कितना मूर्ख है बस एक ये जांचते हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
प्रेम को पाने और पकड़े रखने की इंसान में मुद्दतो से सनक जारी।
जैसे मुठ्ठी में जकड़े रेत जितना भींचोगे उतनी ही सरक जाती।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पूर्णिमा में द्रोहणाचार्य की भी पहचान करिएगा।
चाँद की रौशनी में सही ये एक उपाए रखियेगा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दुःख है, दुःख का कारण है, कारण का निवारण है।
"अप्प दीपो भव" से मनुवाद गुरुओं का निवारण है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सोच विचार से बिन माने कुशल लोग ही मुझे पहचानेंगे।
आस्था की ज़रूरत नहीं लोग अपने अनुभव से जानेंगे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बुद्ध, राम, कृष्ण, परशुराम किसे भगवान की श्रेणी में रक्खा जाए।
धमकाने के लिए जो ख़ुद हाथ में हथियार रक्खे वो गुंडा कहलाए।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चलो ठीक है तुम्ही नीट इंसाफ में मुंसिफ हमारे थे।
ईलाज उनसे ही करना डॉक्टर तुमको जो प्यारे थे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने 24 लाख, 24 लाख कह कर मनवा ही लिया।
पंच "फॉन्ट" "टैक्स्ट" और "थोड़े से" के चक्कर में रह गए।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रपट थी कि बजट में होलिस्टिक ख़्याल रोज़गार का होगा।
ट्रॉल आर्मी और ऑनलाइन रमी का राष्ट्रीयकरण होगा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इनको भी राज्यसभा की सीट चाहिए।
और हमे बिना मिलावट नीट चाहिए।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गुस्सा आना या होना गलत होने की है निशानी पहली।
समझ में नहीं आता बात ये मैंने कितनी दफा कहली।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत की फाइलों में यहां रोज़गार है ये मछली पालें।
असल में गांव में पानी भरा है, डूबें है यहां रहने वाले।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
48 मिनट ही बहुत हैं शांति और मौन के।
अब पूछोगे बताओ वे महावीर थे कौन से।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
परेड सेना का अनुशासन है वो नेताओं को सलाम नहीं करती।
मंच और मौके को ध्यान में रखें जी हां गलत है आपकी भरती।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नाचों जितना नाच सकते हो भूल कर ख़ुद को।
खर्च करने से यह विधा ख़त्म नहीं होने वाली।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ख़ुदा निराकार है तो मस्ज़िद की ज़रूरत क्या।
ईश्वर सर्वव्यापी तो मंदिर में ही क्यों मिलता है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
डीजे, चकाचौंध, गाड़ियां, नशा और लफंगई।
कोई तुक भी है जो तुम अब भी यात्रा बोलो।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सारिपुत्र सा शिष्य कोई हो क्या तुलना मैंने करनी।
जो जितना जानेगा उस से कैसे निंदा मैंने करनी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
याद रखें विरोधी हमेशा किए पीठ खड़ा रहता है।
यूं कि खूँ रगों में दौड़ने के बजाए गली में बहता है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सारिपुत्र और मोदग्लायन में थी शंका की बात।
अश्वजीत ने दिखलाई दोनो को मेरे बारे में याद।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत की शय पे में गज़ब ऐंठा है।
पंच ख़ुद को परमेश्वर समझ बैठा है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
स्मृति ना भूली जाए ये कंगना बोले जाए।
बांसुरी के सुर भी अब नवनीत होते जाए।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
प्रतिक्रिया बांधती है क्रिया करती मुक्त।
मुक्ती इसी में है जाने इतना सा सुक्त।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत के नए चरण चुंबको में जुड़ते डिब्बे बड़ती रेल।
आप देखना शुरू कर चुके दी लल्लन भईया का खेल।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत झोला उठाने की नौबत कहां पहचान पाएगी।
कि जैसे सब छोड़ छाड़ एक दिन हसीना भाग जाएगी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत पीछे पड़ी हो तो कैसे बचाना सर।
किलो दो या ग्राम सौ वज़न तो बहाना भर।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
समाधी केवल समान अवधी के लिए कारगर होगी।
तपस्या में हैं केवल ताप की समस्या से पीड़ित रोगी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हर तरक़ीब थोड़ी रह गई बिन जाने ज़िंदगी छोटी रह गई।
बुद्धि तेज़ थी उसकी सिर्फ़ मानने से अक़्ल मोटी रह गई।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
छोड़ने की अभिलाषा वो रखता है जो पकड़ने में माहिर।
माफ़ कीजिए आप दुनियादारी में साक्षी होने में शातिर।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने आज किले से कथनी और करनी को अंजाम दिया था।
इन्होंने ही बिल्किसबानो के बलात्कारियों का सम्मान किया था।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जो किए याद पार्टिशन की फ़िर हालातों पर आंसू बहाते।
वो दलितों के हज़ारों साल के शोषण को कहानी बताते।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कर दाता सरकार चलाते और कॉरपोरेट पाते कर छूट।
किसान खुदकुशी कर लेता और "नी" लेता अमृत घूट।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत के दौर में जालसाज़ी कर गुमनाम शहीद आ रहे हैं।
हथकड़ी में, श्याम-श्वेत जाति लिखी कोई भी फोटो दिखा रहे हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत बड़ी लाचार है ख़ुद ही ख़ुद ही से न्याय मांगती।
महिलाओं की सुरक्षा के मामलों में ख़ुद ही को ढाँपती।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
आभूषणों और श्रृंगार से ढक दिए गए।
मूर्तिया बुद्ध की थीं बना और दिए गए।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
महावीर को गौशाल दे चुनौती, बुद्ध को दे देवदत्त।
जीसस को जुडास चुनौती किसका कितना महत्त।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नशा सिर्फ़ शराब या कुछ पीने से होता तो बात और है।
तेरे पास बैठ कर सुन तेरी बात गर होश है ये बात और है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कहें यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।
रमंती देवी क्यों नहीं क्या जरूरत देवता।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
द्रौपदी का चीर,शूर्पणखा की नाक, होलिका की चीखें।
कभी सोचा है बच्चे हमारे धर्मग्रंथों से क्या कुछ सीखें।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत लैटरल एंट्री से क्या हम को कर दिखाना चाहती।
निजी स्कूलों के निजी क्षेत्र से अमीरों को योग्य आँकती।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हठ योग जिसे कहते हैं क़िताबों में यहां की।
बेबसी और लाचारी को दर्ज़ करते चले गए।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चांदना हो गया तारो की रुख़सती हो चली।
लेट गया उठते ही सुबह ही मयकशी हो गई।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
उसे शिक्षक होने का कुछ ज्यादा घमंड था।
ज़रूरतमंद को कहता है मैं सिर्फ़ बताऊंगा।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चादर झाड़ दी धूल हट गई, यह कोई बड़ी बात नहीं।
शास्त्र-वेद बदलो इसी तरह,भाषा की सही बात यही।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हर संत का अतीत है और है हर पापी का भविष्य।
कुछ को कहा ये कनिष्ठ हैं और कुछ हैं यहां वरिष्ठ।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत में राजा स्वत: विवेक में नित नए संज्ञान लेता है।
पहले दीवार में चुनवाता था अब बुल्डोजर से गिरा देता है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रेलवे और सेना के बाद वक़्फ़ है ज़मीनों का मालिक।
वाक़िफ़ ही ख़ुद कहने लगे इसमें कौन लोग शामिल।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
NPS या कहिए UPS हुक़ूमत खेलेगी संशोधनों से।
10% और ग्रेटुएटी से बरगलाती चुनावी प्रलोभनों में।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
तंत्र, वाम और अघोर ये तीनों चिंतन के नियामक।
है अनुभूति के रूप में स्वान्तः सुखाय से निवारक।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
उपवासी व्यक्ति भोजन की सौचे झूठा व्यक्ति सच।
नाटक करते सब रहते कैसे उल्टे से रहें हम बच।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हक़ के लिए अमल करना है फ़िर आमाल क्या देखें।
मेरी बात पर लाज़वाब हैं अब जीत या हार क्या देखें।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इश्क़ जो मिथकों या इतिहास की किताबों में दिखाते हैं।
ये लेखक मीरा और रैदास की मुहब्बत क्यों छिपाते हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
परमात्मा बनने की होड़ में तू मोक्ष ढूंढ रहा है।
उम्र बढ़ने से ये बेअक्ली के सवाल पूछ रहा है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत के इस दौर-ए-वक्त को तुम्हे एक कागज़ सिखाएगा।
कौन हो, कैसे ही, किसके हो, कहां हो ये सर्टिफिकेट बताएगा।

कल शाम नुकड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत मानती "साथ रहेंगे नेक रहेंगे बटेंगे तो कटेंगे"।
यह धमकी है, हम आवाज़ उठादे तो नक्सली कहेंगे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ना घुस आया है ना घुसा हुआ है,याद है हुक़ूमत का कहना।
लखनऊ चली वंदे भारत में छेड़खानी सुन फ़िर याद आया।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बाबू बैठा सीट पर कहे आपसे दीजिए मेरा क्या भोग है।
करिए शिकायत उसकी यह कौनसा आपका गुप्त रोग है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ना घुस आया है ना घुसा हुआ है,याद है हुक़ूमत का कहना।
लखनऊ चली वंदे भारत में छेड़खानी सुन फ़िर याद आया।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने दलितों की शक्ति हमेशा कम आँकी है।
और एक स्तंभ भीमाकोरेगांव में बनना बाक़ी है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मोल म्यान का हो रहा देखो पड़ी रही तलवार।
जाति साधू की बता रहे हुक़ूमत के अख़बार।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सिद्ध होने के लिए ज़रूरी है सिर्फ़ जानना।
मानने वाले तो मंदिरों की लाईन में लगे हैं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धन, पद और प्रतिष्ठा में खोए इस दुनिया के लोग।
कमियां शरीर में हैं नहीं पर ये हैं मस्तिष्क का रोग।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नालंदा गर रास ना आया हो गए वज्रयान।
मन कल पर टालने के लिए रहता है तैयार।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
भारी सी ये बात है और बड़े हल्के से कहूंगा।
सिर्फ़ तुम्हे ख़ुश करने के ना चस्के में रहूंगा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कक्षाओं में जो पढ़ाना था वह सड़को पर पढ़ाना है।
पढ़ाना जानने से था हुक़ूमत कहे मानना पढ़ाना है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत कत्ल कर बनाती बहाने, था उस वक्त रात, ठंड और कोहरा।
"ठोको" नीति जात देख रही मंगेश के बाद देखें कितने बनेंगे मोहरा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
संस्कारी बलात्कारियों को देखना है तो आप गुजरात आएं।
बांटो और शासन करो की वैदिक नीति में कुसलात पाएं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मुझे करीने से सजाया कुदरत ने ख़ुद से।
एक तुम हो जो मेरी उम्र ही देख रही हो।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने रोज़गार दिया है आप क्यों करते हैं भ्रमित।
क्रिकेट की दुनिया में पाता धंधा जिसका नाम अमित।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
साज़ और साज़िंदो का पूरा जीवन भी एक जातिगत खीज है।
शास्त्रीय संगीत द्विजन के और लोक संगीत हम लोगों के बीच है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
एक ने चांद के दो टुकड़े किए दूजा सूरज ही खा जाए।
अंधविश्वासी ख़ुद गढ़े कहानी और स्वर्ग या जन्नत पाए।।




कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बाबू बैठा सीट पर कहे आपसे दीजिए मेरा क्या भोग है।
करिए शिकायत उसकी यह कौनसा आपका गुप्त रोग है।।



कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत हर चुनाव में गरीबों के घरों को पहचाने आती।
शराब तो साथ लाती है बस क़िताबे नहीं पहुंच पाती।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ना वो त्यौहार अपने घर मनाता है ना ही पत्नी के साथ।
घर किसी का पत्नी किसी की पर बीच फ़ोटो के आप।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
येचुरी ने दान की देह विज्ञान के संस्थान पर।
ना जुलूस, ना घाट, नाम नहीं संस्कार पर।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कोई सिकंदर जीता नहीं कभी यश की दौड़ में।
हारने वाले जितने थे क्या मजबूरी में गौण थे।।



कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
भय बिनु होई न प्रीति कहते रामचरित में तुलसी दास।
मुग़ल काल में लिखी मानस पर लिख ना पाए हाल।।



कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मूर्तियां टूटने की बातें याद दिलाती हैं घटनाएं युद्ध की।
का'बे में टूटी थीं और टूटी थी सिर्फ़ शांतिप्रिय बुद्ध की।।



कल शाम नुक्कड़ आप बुद्ध मिले कहते थे,
मिस्टर गांधी को जब एक हिंदू ने मारा तो जिन्ना डर गया।
धर्मांध पाकिस्तान भी ढूंढे मुल्क की बारात का वर नया।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हिंदू मुस्लिम सिख बौद्ध चार्वक हां मैं धार्मिक हूं।
शब्द समझ से चुनिए बस मैं सांप्रदायिक नहीं हूं।।



कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कहानी में सीता को चुराया था ब्राह्मण ने रावण ने नहीं।
कहानी लिखी भी थी तो शूद्र ने किसी ब्राम्हण ने नहीं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत के इस अंदाज़ को रिझाना कहते हैं।
देसी बॉन्ड, इसे बैठना नहीं टिकाना कहते हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सिवाए रुपयों के जिसके पास कुछ भी नहीं।
वास्तव में देखिएगा तो वही सबसे गरीब हैं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
भीड़ में सपेरा जिस तरह बीन की धुन बहरे सांप को सुनाता है।
उसी तरह पुजारी मंदिर में धूंप दीप नैवेद्य संग आरती गाता है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रो-धो कर जिंदगी बिता दी रही चिंता दिन और रात।
एकांत का रस जिसने पिया इसे अमृत से क्या काम।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत कितनी गिरेगी धर्म के अनुष्ठान में।
पंडित मौलवी बिमारी हैं मेरे हिंदुस्तान में।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चलिए मरना तो एक दिन सभी को है कोई नई बात नहीं।
फ़िर भी फर्ज़ी एनकाउंटर ऐसा देवा भाऊ सही बात नहीं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नई रूहें नया मक़सद ले कर नए ख़्वाब शायद देखेंगी।
पर मुल्क में आवाम जवाब लेने हुक़ूमत को नहीं घेरेंगी।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत कहे सनसनी लड्डुओं की फैला कर मूर्ख बनाया जाए।
स्वास्थ, शिक्षा और रोज़ी भूल धर्म के नाम पर उत्पात मचाया जाए।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
फ़क़त पूछा था क्यों मुल्क में उम्मीद बियाबाँ हो रही।
हुक़ूमत के चेहरे पे सुनते ही तशवीश नुमायाँ हो गई।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लाला के षड्यंत्र से बचने ये पत्रकार किधर जाएं।
क्लोजर रिपोर्ट में साफ़ हैं प्रणय और राधिका राय।।


कल शाम नुक्कड़ पर बद्ध मिले कहते थे,
इन लड्डूओं ने ही समाज में तमाशा बना के रख दिया।
कई लड्डू नॉन वेज थे तीन लड्डूओं ने टॉप कर लिया।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
किराना-फ़रोश ने भी आज ख़ुद हार मान ली।
उधार लेने गया था उसने बही मुंह पर तान दी।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
निरंजना के तट पर सुजाता पेड़ को चढ़ाने खीर ले आई।
ब्राह्मणों के मंदिर थे ये दरिद्र शूद्र महिला बुद्धत्व ले पाई।।


कल शाम नुक्कड़ पे बुद्ध मिले कहते थे,
मूल निवासियों के लूट लिए घर, खेत, सुख और दालान।
आज देख रहा हूं मैं भी पा-रंजिथ की फिल्म थंगलान।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
भैंस के गले का घंटा एक चोर निकाल दक्षिण में भाग लेता है।
दो चोर भेंस ले उत्तर भागे, ग्वाला सुन घंटा सिर्फ़ दक्षिण लेता है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इंतज़ार किसका जो बता दे उस पार बंदा है या अल्लाह है।
नदी के इस किनारे नाव है, हम हैं पर ग़ैरमौजूदगी मल्लाह है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इंड्रस्टलिस्ट और बिजनेसमैन में सिर्फ़ एक अंतर है खास।
टाटा स्थापित करे उद्योग अदानी करे सिर्फ़ धंधे की बात।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
महिषासुर तो सुर था पर कैसा हत्या का जश्न।
अंधविश्वास से लोगों में नही उठता इतना प्रश्न।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अप्सराओं और हूरों को पाने की हवस इन मर्दों को ललचाती।
किताबे धर्म और मज़हब की औरतों में सिर्फ़ वासना बतलाती।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने ख़ुद कत्ल कर कहानी कुछ यूं पिरोई।
हर बार कहे इस हत्या के पीछे था लारेंस बिश्नोई।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
क़व्वाली कला है जो शमा को परवाने से मिला देती।
ये सोच समाज में मर्द और औरत के भेद मिटा देगी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने व्यवस्था न्याय की घर जा कर पटा ली है।
इस न्याय की मूर्ति ने सुना आखों की पट्टी हटा ली है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दूबे ने मस्ज़िद में अब्दुर्रहीम संग रह संस्कृत में ये नहीं लिक्खा।
चौपाई थी श्लोक नही और ना थी मुग़लो को ताड़ने की इच्छा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नागप्रसन्ना प्रसन्न करने में लगे हैं हुकूमत के ख़ास प्रच्छन्न को।
संपन्न हैं उत्पन्न हैं पट्टी भी हट गई अब कुछ नहीं जो आच्छन्न हो।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पीढ़ी धर्म में इतनी अंधी हो चली है।
प्यार पर हिंसा की जीत हो रही है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हबकि न बोलिबा, ठबकि न चालिबा, धिरै धरिबा पांव।
गोरखनाथ कहें फीका शहर है, था पहले चमकीला गांव।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ग्रंथों और शास्त्रों में क्या लिखा, किसने लिखा, कब लिखा।
शोध सामाजिक षडयंत्र पर किया तो मुझको यह दिखा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मीरा की भक्ति जो रैदास में थी हर दिल से निकले आह।
भक्ति आज एक्सचेंज बनी बदले में बदला पाने की चाह।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत चाहती है कि कुछ भी करके हुक़ूमत की बनी रहे रीती।
मुल्क में जो चल रहा है वो है फूट डालो शासन करो की नीति।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मूर्ति के हाथ संविधान ख़ुद भरोसे भगवान के।
चंद्रू चला गोगोई जैसे ले आदेश जजमान के।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दो सगे भाई लड़ेंगे माना यहां हम सभी गैर हैं।
फ़िर भी मुस्कुराएं आज फूल वालो की सैर है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दृष्टि बदलें सृष्टि जल्द बदल जाएगी।
सम्यक होंगे तो ही सूक्ति मिल पाएगी।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
माना की हनीमून पीरियड होता है पहले रिटायरमेंट के।
माननीय इतना तो पर कीजिए कि हम को न दिखाई दे।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पैसा लूटो, ज़मीन हड़पो, लोगों को बहाने सिखा दो।
कुछ नहीं करना यहां बस तुम कोई मंदिर बना दो।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सामने आपसे हंसने, खाने, नाचने की दरख़ास्त।
पीछे फ़ाइल में हरी स्याही से लिख दिया बर्ख़ास्त।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जिस को जितनी हांसिल उसे नई रौशनी उतनी मुबारक।
विद्युत, बिजली, चमक पर हुक़ूमत की नीति कुचालक।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
तुम्हारा मन तुम्हे कभी सच और ख़ुद को जानने नही देगा।
दिमाग़ भी देख चुप रहता है जैसे बढ़े ख्वाहिशों का घेरा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इन्हे नशे में क्यों हर चीज़ दो या हिलती क्यों दिखाई देती है।
उम्मीद की आस भटकने से बचने में शंका से एहतियात देती है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अदानी, अंबानी, बिरला, टाटा और भारती।
मजदूरों की आशा इन पांचों के रहते हारती।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नैतिक, अनैतिक और निर्नैतिक में उलझी सारी नीतियां।
दर्शन और हिंदी के शिक्षक भी झाने ख़ाक जारी रीतियां।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मध्यम मार्ग पर चलिए दुःख निरोध में शून्य सत्य को पाता।
जो भी है उसका कारण हैं बिन कारण कितना किसको आता।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पदार्थ, संवेदनाएँ, अनुभूति, रचनाएँ और चेतना हैं पंच स्कंध के रूप।
लिंग मान बैठे जिनको तुम तर्क कसोटी के स्कंध में वो है बुद्ध स्तूप।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अवमानना कोर्ट की इस से ज़्यादा कुछ हो नहीं सकती।
जज ख़ुद कहे न्याय संविधान से नहीं भक्ति से दे पाया।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
आख़िर में सफ़ाई से माननीय सफ़ाई देते हैं।
देखें रिटायरमेंट के बाद रिश्वत में क्या लेते हैं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ठेकेदार बढ़ गए हैं सरकार घट गई।
मज़दूर ने हक़ मांगा और नौकरी गई।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
झूंठ पच नही सकता और हमेशा अलग थलग रहता है।
झूंठ धुआं है, फफूंद है, बीच हमारे नेता बन के रहता है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कीर्ति पत्रिका को धर्मवर फसाद ते उन्हा दे इलाज़ पढ़ने के लिए लाइए।
कहते हैं क्रांति बम और पिस्तौल से नहीं आती नही, विचार चाहिए।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ब्याज बढ़ा और हो गया मूल से पूरा दुगुना।
लाला बही को लिखता जैसे अविरल यमुना।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बिन शब्दों के भी मैं बोल दूंगा पर तुम क्या समझ सकोगे।
आवाज़ नहीं भावों को लगा दूंगा ना कहना हम हैं बतोले।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत कटने की बात करती पर अ-मर दब गया।
बरौनी जंक्शन पर शंटिंग करते शंट कैसे हो गया।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शंकराचार्य ख़ुद नागार्जुन से दर्शन का ज्ञान सीखते जाएं।
तर्क को सबसे अंतिम रक्खे फ़िर कहें तर्क भी शून्य हो जाए।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत के लिए चापलूसों की नई जमात जल्लाद बन गईं।
सक्षम अधिकारी बन शैक्षणिक संस्थाओं को बर्बाद कर रहीं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नुमाईश अस्मिता की होगी मालूम था पर इस क़दर।
बनती थी एक ज़माने में फ़ाइल पर लंकेश की मदर।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ख़ुद भीतर ध्यान और बाहर प्रेम फ़िर देखे चमत्कार।
काव्य, शिलता और सौंदर्य खोजें नही कोई दरकार।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बड़ी साधना सीधा चलना पर सब कुछ गोलमगोल।
धरती जिस पर हम रहते उसको क्या कहता भूगोल।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दुर्घटना में गाड़ी से मर गए नौजवानो पर लोग दाऊ बन रहे।
सीटबेल्ट, नाबालिक, सड़क की दशा छोड़ सिर्फ़ दारू कह रहे।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत को अब सरकारी नौकरी में रामभद्राचार्य की सिफारिश चाहिए।
मनुस्मृति लागू है जगह संविधान के अब भी तुम्हे कैसी गुँजाइश चाहिए


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हर साल का तमाशा है या कि नवंबर का मिज़ाज है।
बच्चों के स्कूल में अब ये नई छुट्टियों का रिवाज़ है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
समन समण या बुज्झ या फिर कहेंगे बुद्ध।
जानेगा वो मेरा होगा क्या पापी क्या शुद्ध।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
विश्वगुरु हम नासा के आसरे हैं, नासा ख़ुद दक्षिण कोरिया के।
मीडिया चिल्लाती कहे किसान धुआं उड़ाते धान की कोशिका से।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत के यह अनपढ़ मंत्री चलाते कैसे अपना मंत्रालय।
बंद हो गए डेसू, MTNL, संस्थाएं या फ़िर अब विश्विद्यालय।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सुबह के अख़बार में किसी की मौत का इश्तिहार होगा।
पता लगा है अमेरिका में कोई अदानी गिरफ़्तार होगा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अहमक़ बाशिंदे भी बड़े उम्रदराज़ रहते मुल्क में।
कमबख़्त तजुर्बा मुफ़्त, है सिर्फ़ अक्ल शुल्क में।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
भय और प्रलोभन सिर्फ़ ये दो स्तंभ हैं भगवान के।
अर्थ है चोरी, हिंसा, अत्याचार और झूठे बखान से।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
त्योहार जो धर्म में किसी भी हत्या से जुड़े हैं।
कथाओं की माला में झूठ के नर मुंड जुड़े हैं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत में संभल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी कमाल हो गई।
कहती है गोलियां मिली नहीं वो सभी के आर पार हो गई।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
संभल - संभल के देखिएगा अभी कई संभल मिलेंगे।
खोदेंगे या खुरचेंगे तो बुद्ध मिलेंगे, ये भक्त मंदर कहेंगे।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जंत्र, तंत्र, मंत्र, संयंत्र, सुमंत्र या फ़िर कहें षडयंत्र।
संविधान अगर दिखता है तो माने हैं आप स्वतंत्र।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
तुम जानते हो तो मान लेते हैं कि यहां भगवान दबा था।
मूर्खता की इसी कसौटी से धर्म के लिए अपमान बना था।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ख़ुद आवाम को दिलाएगी मज़हब से घिन।
फ़रमान, मशवरे, नसीहतों और हिदायत के दिन।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सारिपुत्त को कहा धर्म-सेनापति पर था नहीं हिंसा से कोई अर्थ।
भुजाएं फड़के, हथियार निकले, खूं बहे नहीं ऐसी कोई शर्त।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत है चालबाज़ या फ़िर क़ाज़ी की जमात है।
किसने काटा कौन बांटेगा क्या बेवक़ूफ़ अवाम है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत दरबार लगाने की सनक रखती हैं।
आवाम में हाथ फैलाने की समझ रखती है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
किसी धर्म में शामिल नहीं थे इन्हें एक धर्म में छूना भी मना था।
अनुच्छेद 341 में डाल कर इनको शेड्यूल कास्ट कहा था।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत मुखालिफ़ हो गए लोगों को जाकर तोड़ लेती हैं।
बंदूक,पैसा,काज़ी और पीछे मुख़बिर लगा मोड़ देती है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गौर कीजिए नए हलफनामों में जो दबें हैं वो सिर्फ़ शिव हैं या लिंग है।
असल में बुद्ध है, स्तूप है जिसे बनाने में अशोक या कनिष्क जैसे किंग हैं।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हराम की खाना हो तो राम कहें।
राम को पाना है तो काम करें।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गलतियों से सीख लीजिए ये कोई बुरी नहीं।
जाने सच में भी बात कोई ऐसी मिली नहीं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चौथा मिलेगा आज देखें क्या मिज़ाज हैं।
हुक़ूमत में अब सिफ़ारिश का रिवाज़ है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत लेपटॉप में डाटा और कुर्सी के नीचे नोट डाल देगी।
बदलते नामों की बीच बेशर्मी से मंदिर-मस्ज़िद नाम लेगी।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मसौदे में 7165 संशोधनों को पढ़ना और निस्तारित करना।
ज़रूरी है बाबा साहेब अंबेडकर के काम को विस्तारित करना।।



कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ना भूत ना ही मुझे कोई भी भगवान चाहिए।
विधि के ना यजमान और जजमान चाहिए।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बुद्धि का उपयोग करें बचें आत्मविभोर से।
देखते ही पर्याप्त दूरी बनाएं चुग़लख़ोर से।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत अनुदान नहीं देगी अब बस देगी तो उधार।
शिक्षित धंधेबाज नहीं, अब हैं ये धंधेबाज सरकार।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ज़रूरी नहीं है फेसबुक पर आकर प्रोफाइल लॉक्ड करना।
यूं भी घर की खिड़कियों के परदे हवा से सरक जाते हैं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
माननीय शेखर के शब्द संविधान को तोड़ रहे हैं।
कुछ नहीं, वे सिर्फ़ रिटायरमेंट प्लान जोड़ रहे हैं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बच्चों में प्रतिभा का विकास ना धर्म से होगा ना मज़हब ही करेगा।
इनके साथ तो बन जमुरा उस्ताद के लिए सिर्फ़ करतब करेगा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रामकृष्ण को गले का कैंसर न तर गला हो पाए।
विवेकानंद समझे बिना काली-काली कहे जाएं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत की ज़हनियत कैसी है बूढ़े, बीमार और विकलांगों के लिए।
ज़रूरत ही क्या है कि आवाज़ उठानी इन ज़रूरी मांगो के लिए।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गौतम कहेंगे नशे और बहकने को ये समस्या है तुम्हारी।
कबीर आधे होश और आधी बेहोशी को कहते खुमारी।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कबीर बिखरे हैं, अनगढ़ हैं, फैले जैसे हिमालय का जंगल कोई।
रैदास के साधुक्कड़ी प्रेम में मीरा मरने तक ना बन चंचल सोई।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
साधु ने कहा कि शास्त्रों में समानता नहीं लिखी।
मैने कहा कि अभी लाओ शास्त्र मैं लिख देता हूं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इश्क़ में मज़ा नही जिसमें खतरे में जवानी ना हो।
वो इश्क़ ही क्या इश्क़ है जो याद ज़बानी ना हो।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत में नहीं मिलते अब हम जिन्हे मान लें ज़हीन।
संसद में नुमाइंदे बन चापलूसों की जमात करें यक़ीन।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अम्बेडकर अम्बेडकर कहने के लिए फैशन ही नही जज़्बाती वर्ग चाहिए।
कोई कहता संसद में कि उसे भगवान से सात जन्मों तक स्वर्ग चाहिए।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने मुस्लिम के बाद दलितों के लिए ज़हर घोल दिया।
नेताओं ने अपने मन की बात को आज सभा में बोल दिया।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत का गलती करके जिम्मा ही खोजना।
पहले ख़ुद ही नोचना फ़िर चिल्ला के बोलना।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत की कोशिश है कि मुद्दों को भटकाती जाए।
विपक्ष भटक कर ख़ुद से ख़ुद ही को हराती जाए।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
विधि तरीके मैं बतलाऊं तुमसे कैसे क्या करवाना।
दरवाज़ा तो बनवा लिया पर चौखट ना बनवाना।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दिवानी, मस्तानी, परवानी और होश गंवाने आई।
मदहोश मीरा रैदास के पास भूल हर फसाने आई।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
एकांत में बैठें आत्ममनन करें अलग और आप अकेले रहिए।
दिल का दर्द रहेगा जिंदगी के साथ आप चैन से मज़े में रहिए।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
निर्वाण कोई मंज़िल कोई ठिकाना कोई अंत नहीं।
जानते बूझते जो शून्य में जाते हैं रहे जीवंत वोही।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
एटर्नल रिटर्न के दर्शन से गर जीना आसान करना है।
सोचिए जो कर रहें हैं वो आपको दूसरी बार करना है।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ओंछी छिछोरी तुच्छ बात सुनाने में मज़ा खोजता है।
कुमार सिर्फ़ विष के विश्वास पर ही इतना बोलता है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वो ख़ुद इत्मीनान और ख़ुमारी में करने लगा बसर।
जो खुश नहीं थे बकते थे कि है ये शराब का असर।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वैसे तो मैं वो इंसान हूं जो कोई भी जानवर पालता नहीं।
फ़ुर्सत में दिमाग़ घेर लेता है और दिल है जो मानता नहीं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत के नए दौर में विज्ञान की किताब में ना डार्विन मिलेगा।
गणित में लाभ या हानि पर टैक्स, टैक्स मार्जिन पर लगेगा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहातेंथे,
कठिन रास्ते और कठिन फैंसले साथी साथ छोड़ते जाएं।
यात्री बने,रास्ते बनाएं बिना भेड़चाल मक़सद पाते जाएं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे
उबरमेन्श जब आएगा तोड़ के वर्तमान की हर्ड मेंटलिटी।
बाक़ी आमोर फाटी से अपने अंदर देखें कोई फैसिलिटी।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शांत आवाज़ सुंदर आगाज़ और सौम्य मिजाज़।
बायोलॉजिकल मनमोहन जैसे ज्ञान का सिराज।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नफ़रत पहाड़ों सी दुगनी होती जाए।
इश्क़ गिनती सा आहिस्ता चलता है।।




















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