D July to December 2025 (17)

 कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,

हुक़ूमत इंसान को भेज सीवर में कहे मैला खसोट ले।
उसी इंसान को कहती है, चुनाव में EVM से वोट दे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पागल कह के इतिहास में सच को दफ़नाया गया है।
झूठ ने धर्म के भेष में यह इंसान से करवाया गया है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने आवाम में ग़रीबो को अब पहचान लिया है।
नाम छांट कर उनका नई वोटर लिस्ट से काट दिया है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
प्रार्थना और ध्यान में दो बहुत ही अनूठी व्यवस्थाएं हैं।
पहली में बाज़ारी शक्ति दूसरी में ख़ुदी से प्रार्थनाएं हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ख़ुद के लिए जो चाहते हो वो दूसरों के लिए भी चाहों।
ख़ुशी अपने लिए मांगों तो दूसरों की खुशियों को चाहों।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत कांवड़ की आड़ में वोटर को टटोल रही है।
धर्म की सभी कोशिशें धंधे सी गोल मटोल रही हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इस्तीफ़ा नहीं आवाम इसे रणछोड़ कहेगा।
नरेंद्र मन से तैयार है अब राष्ट्रपति बनेगा।।



कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धार्मिक मर्द पेट में रहा फ़िर जन्मा और बाद में देता जवाब है।
योनिया तो चौरासी लाख हैं पर इसमें औरत सबसे ख़राब है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नतीजा सच के साथ खड़े होने का सामने होगा।
झूठ झुंड बना कर धमकाते हुए आपसे बोला।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अंट-शंट बोलिए या सधुकक्कड़ी में आ जाईए।
ख़ुद समझ समझाने की झंझट से फ़ना पाईए।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत का एक दिन मालूम था कि मैं नश्तर खाऊंगा।
रात बहुत हो गई सो जाओ तुम मैं कल दफ़्तर जाऊंगा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पच्चीस प्रतिशत टैरिफ लगा दिया ऊपर से जुर्माना।
छप्पन इंच की छाती म्याऊं को बोले अपना गुर्राना।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने जीना ख़राब कर बोझ सीने पर सुलगता दे दिया।
सवाल पूछा मैंने हक़ से तो मेरे हाथ में एक गुलदस्ता दे दिया।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
विश्वगुरु का भूत बना रखा है पर मीडिया की कोशिश है।
रिकार्ड में फिसड्डी ये आत्ममुग्ध चाटुकारिता मौखिक है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत जानती है वोटर कैसे घटाएं और बढ़ाएं जाते हैं।
यह केंचुआ धीरे-धीरे लोकतंत्र की ज़मीन खोद रहा है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सिद्ध और सदगुरु कौन है तर्क से आज आपको मनवाएं।
सिद्ध ख़ुद जाने अर्हत सा और सदगुरु दूसरों को जनवाएं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सूरज स्थिर पर पृथ्वी घूमें और कहते हो गया झूठा सूर्यास्त।
गैलीलियो ने कहा माफ़ करें पर सच्चा विज्ञान झूठा शास्त्र।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत बरसाती पानी के शहर में भरे होने को जान लेती है।
सवाल पूछे तो सिर्फ़ मिंटो ब्रिज - मिंटो ब्रिज का नाम लेती है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दीवार पर अम्बेडकर की विवेकानंद उकेरा जाएगा।
विश्विद्यालय का नाम भी जल्दी ही बदला जाएगा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ख़ज़ाना घर में पड़ा था जिसे ढूंढ़ने में तुमने घर छोड़ दिया।
पाना था परिवार में तुमने तीर्थ से खुद को क्यों जोड़ लिया।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
आज मैने किसी शीर्ष के स्पर्श चरण करने की घटना की है।
जो लेटने को आतुर थे उन्होंने नफे-नुकसान की गणना की है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
द्रोणाचार्य आज भी विश्विद्यालय का अंगूठा काटने में लगा है।
एकलव्य जानता है तिलक तराज़ू और तलवार ने कैसे ठगा है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शास्त्र या धर्म पुस्तकों से सिखा जो वो सीधा साधा मूर्ख।
गुरु बनाया जिसने धर्म सिखाया वो निकला सबसे धुर्त।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बहिश्त के फ़रिश्ते और स्वर्ग की अप्सराएं शराब से लैस हैं।
चार्वाक बदनाम हुआ जिसने सब यहीं सीधा मुहैय्या कर दिया।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ECI होशियारी से BLO का ठीकरा BLA पर फोड़ रहा है।
हुक़ूमत हो या संस्था दोनों ने इसे बयान में जोड़ कहा है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बौखलाया एक मास्टर जो मिश्रा लगाता है जात से।
षड्यंत्र कर रहा और मिश्राओं से मिल मेरी घात में।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
माताओं, बहुओं और बेटियों का नाम जिसने ज़िक्र में लिया।
केचुआ ये उनके घर से निकल वोट देने की ही फ़िक्र ले रिया।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ट्रंप का टैरिफ भारत की आर्थिक स्थिति हिलाने से रहा।
पांचवीं, तीसरी, पहली आर्थिक व्यवस्था गिराने से रहा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत के इशारे पर क़ायम है अंधकार।
अब्दुल के नाम से कई रौशन है पत्रकार।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दूसरों को सताओ या ख़ुद को हिंसा तो हिंसा ही रहेगी।
मोहनदास की शिक्षा इंसान को पट्टी उल्टी पढ़ा कर रहेगी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हूंपन, मैंपन और एक और शब्द बच गया है जो क्योंपन।
आँख को आँख ही कहेंगे पर ये ग्यानगुंडा कहेगा लोचन।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हनुमान को अंतरिक्ष में पहुंचा के क्यों, क्या कैसे जानेंगे।
इज़्ज़त लुटवाने के बाद भक्त भद्द अपनी पिटवाके मानेंगे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रामभद्राचार्य ने प्रेमानंद को घेर लिया संस्कृत के नाम से।
झूठी जाति और झूठी ठसक जारी है भाषा के संग्राम में।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कपास भारत की फ़सल को पढ़ा था मैंने शान से अपनी किताब में।
भारत के किसानों की कोई औकात नहीं ट्रंप और नरेंद्र के हिसाब में।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत की ग़लत नीतियां डर से अमेरिका की तरफ़ मुड़ी है।
भारत की नक़दी फ़सल है कपास रोज़गार से सीधे जुड़ी है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ये अंबानी-अदाणी की हरकतों में युवाओं को देती गाली है।
रोज़गार छिन जाना, रोज़गार ना मिलने से कहीं ज़्यादा कष्ट वाली है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नितिन ने नामित नन्हा निखिल किया है नया धंधा इथेनॉल।
पेट्रोल के खेल में शामिल चोर-उच्चकों से भरा हुआ है हॉल।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पेंशन के लिए ही सही पट्ठा वापस तो आ गया।
मोहलत हो गई थी उसके इंतज़ार में।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
फिसलती रही, बदलती रही सुनवाई कोर्ट में टलती रही।
भीमाकोरेगांव याद है हमे और दुनिया यूहीं बदलती रही।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत की चाटुकारीता में कई पंथो का कोई जवाब नहीं था।
सूफ़ी राजधानी से अलग रहते थे इसका उन्हें कोई मलाल नहीं था।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धौला कुआं था धौला पीर था और धौला प्याउँ था।
दिल्ली से गर इश्क़ है तो शाम को मिलने आ जाना।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मेन मीडिया नहीं मनु मीडिया है।
लोकतंत्र की उतरती सीढ़ियां है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत वाक़िफ है कि तारीख़ मनमर्ज़ी से बदला नहीं करतीं।
बदलते नाम और पुते नए रंग देख आवाम हकला नहीं करती।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
श्रुति और स्मृति में परंपरा का बेड़ा ग़र्क कर दिया।
शास्त्र पढ़ कर या लिख कर जुड़ झूठ दर्ज़ कर दिया।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत की टैक्स पर नीति हमे यह सिखाती है।
उधेड़ खाल जनता की अब मरहम लगाती है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चंद्रचूड़ पर हुक़ूमत के नज़दीक रहने की हवस भारी है।
एक दलाल को राज्यसभा दूसरे को लोकसभा प्यारी है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चंद्रचूड़ पर हुक़ूमत के नज़दीक रहने की हवस भारी है।
एक दलाल को राज्यसभा दूसरे को लोकसभा प्यारी है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इश्क़ और मोहब्बत में शिक़ायत ही शिक़ायत है।
शादी भी अगर हो गई तो दिखावे की रिवायत है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
आज़ादी की लड़ाई में जहां इनमें कोई हिस्सेदार नहीं था।
आज मंच से बोले गए भाषण में कोई जिम्मेदार नहीं था।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
"?" लिख वाक्य में ख़बरे दिखाती है।
मीडिया गोदी की अफ़वाह फैलाती है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अंग प्रदर्शन का इल्ज़ाम मर्द औरतों पर लगाते हैं।
ये मर्द खुले ही सड़कों पर खड़े हो पेशाब बहाते हैं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने तोड़ "justice delayed is justice denied" का निकाला है।
"Justice hurried is justice buried" कह न्याय को छिपाना है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दुःख को दिखाना और बांटना इंसान की फ़ितरत में रहा है।
पीड़ा की नुमाइश को यहां अहसान की ख़िदमद में कहा है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ना बूढ़े ना बीमार ना वजह फ़िर हाथ में लाठी कैसे।
पदसंचलन से आतंक फैलाती हुक़ूमत कितना ऐंठे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ना बूढ़े ना बीमार ना वजह फ़िर हाथ में लाठी कैसे।
पदसंचलन से आतंक फैलाती हुक़ूमत कितना ऐंठे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
प्यारे सपने बिखर जाएं तो बस एक काम आप करें ।
जैसे कांच के खिलौने टूटे तो नाबदारी नज़र कह दें।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अंहकार से लड़ने की ज़रूरत ना कोई रहेगी ।
राख मुर्दे की या वस्तु की एक जैसी लगेगी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धनुर्धर राम और कृष्ण की बांसुरी में फ़र्क यही है।
एक संघर्ष का नियामक है दूसरा समर्पण सही ही।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
भारत में आकर तालिबान ने नज़रे लेज़र से लड़ा लीं।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत ने ही सभी महिलाएं हटा लीं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कब दिखेगा चाँद, कब निकलेंगे
तारे।
महिलाओं की भूख पर मर्द टिके हैं सारे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दुश्मन के दुश्मन को दोस्त बनाओ भागेगा पाकिस्तान।
निति भाड़ में झोंको सजाओ पालकी आवेगा तालिबान।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जिसने भोगा उससे छोड़ा और पाया जिसने त्यागा।
इज़हार इश्क़ जिसने किया वो शादी कर ना पाया।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दुःख अस्वाभाविक लक्षण है, सु:ख है एक स्वाभाविक तत्व।
माना जिसने डूब गया जाना जो दर्शन में है एक सांसारिक सत्व।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दिन थे अमेरिका और रूस के बराबर गुटनिरपेक्ष भारत था।
हालात 80 के बाद है कि पाकिस्तान के मुक़ाबिल हो गया है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने बम फोड़ कर मुल्क में प्रदूषण स्वीकार किया।
दिन दूर नहीं हम सुनेंगे बलि के इंसान ने चीत्कार किया।।

कल शाम नुक्कड़ पर
बुद्ध मिले कहते थे,
काफ़िर है ये आगे इसके मोमिन भी शरमा जाएं।
सिर्फ़ मस्जिद या नमाज़ में ख़ुदा नहीं देखा करता।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
स्वर्ग, जन्नत, मोक्ष, वेद, बाइबिल , हूरें और परियां।
मंजिल मूर्ख बनाना है बस अलग अलग हैं गलियां।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत की एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज को अब आराम होगा।
रिल्स बनाना भी कहती है रोज़गार का एक आयाम होगा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वासना पहचानी नहीं और ले लिया ब्रह्मचर्य वर्त।
शादी जिसने करी नहीं रहा उसका जीवन गर्त।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत प्रदूषण को भी धर्म की नियामत कहेगी।
दिल्ली वालों को ना शिकवा या शिक़ायत रहेगी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
छोड़िए , पकड़ कर मत रखिए संबंध हों या वस्तु।
भूत ,भविष्य और भय छोड़िए वर्तमान में अस्तु।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत कभी ठेकों पर शराब कम नहीं पड़ने देती।
ये दवाएं हैं जो मरीज़ को लाइन से ना हिलने देगी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इश्क़ में बदले या उम्मीद की कोई गुँजाइश नहीं।
दिल की ख्वाहिश है दिमाक़ की नुमाइश नहीं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते ये,
ज़ोहरान भी गायब राहुल भी लापता।
मीडिया घटनाओं को चश्में से आँकता।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दिल्ली के फ़ूल वालों ने इस दफ़े सैर नहीं की।
सुना है हुक़ूमत के DDA ने परमिशन नहीं दी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुनर इल्ज़ाम नहीं ज़रूरत में दिखाते रहिए।
मौक़ा मिलता ही रहे अब ये तो ज़रूरी नहीं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पहाड़ी से गिरता, फिसलता, निकलता, बहता पानी।
जिंदगी में संघर्ष, अस्तित्व, कोशिश, उम्मीद की कहानी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
"अ " से अनार और "क" से कबूतर में भगवान् कहां हैं।
ख़ुद को ही जो हरा दे तो बढ़ के उससे बलवान् कहां हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सम्यक और संतुलन से साधन और साधना सधे।
तर्क नहीं कृत्य का मौन लें जैसे बदनाम हैं गधे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत "घुसपैठिया"बोल चुनाव में भावना से खेलती है।
याद हैं अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को सिर्फ़ केंद्र सरकार देखती है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
झूठ से सीख कर नया झूठ जोड़ कर बाँच रहे बाबा।
यूट्यूब में गंद मचा खुदवाते ताजमहल और काबा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वर्षावास ख़त्म हुआ अब वक़्त है बाहर आजाईए।
मैं आप का,धर्म आप का,संघ पर हक़ आजमाईए।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हिंदू-मुस्लिम, बेरोज़गारी, अंधभक्त हर दिशाओं में है।
दिल्लीवाले परेशान हैं कि ज़हर सिर्फ़ फिज़ाओं में है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कुछ तो इश्क़ में लुट गए कुछ ऐतबार में।
एक अपनों ने घर में लूटा दूसरा बाज़ार में।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
भीड़ कायरों का घर है वो साथ सिर्फ़ भीड़ का देगी।
"एकला चलो" सोच में मेरी ज़्यादा नीड़ क्या होगी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नियत ही आदमी की है ख़ुद को दुखों में उलझाए रखना।
ज़िक्र छेड़ के देखिए कैसे आंसुओं का दिखलाए झरना।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
प्लास्टिक का फ़ूल टिका रहेगा असली फ़ूल मुरझाएगा।
जीवन जीना सिख लीजिए वरना ये भी बीत जाएगा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पिंटू जीता , अनंत जीता, जीत गया गोपनीय ब्लूप्रिंट।
पैसे और आतंक में बिकना लोकतंत्र के खात्मे का हिंट।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रंग चोरी, मूर्ति चोरी, चोरी धम्मो सनन्तनो।
मान मत लेना सुन, पहले जानों सब जानों।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
प्रहलाद टिपानिया सुनाए कबीर सरहद के जो इस पार है।
शौक उस पार का है तो फ़रीद अयाज़ की एक दरकार है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने कर्मचारियों को एक निजी कारिन्दा बना दिया।
सोशल मीडिया सैल में बतौर ख़बर्ची बाशिंदा लगा दिया।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने क़ानून में 100 से ज़्यादा 300 का आचार किया।
मज़दूर को बंद होते कारखाने में रोज़गार से लाचार किया।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
श्रम विधान में गनीमत रही कि 996 शामिल ना हुआ।
तुर्रा यह कि ये नारायण मूर्ति 272 में नामित ना हुआ।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पंचों ने दिलवाई शपत कि मानेंगे संविधान की।
इशारों में ये कह भी दिया बेहतर मनुविधान ही।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बेटी बोल अभद्र टिप्पणी कहती संतोष पर चिल्लाती गोदी मीडिया।
स्तन का टेक्स,सती,देवदासी,ताड़न,कन्यादान हैं किसकी बोई कीमिया।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जो दुःख था कभी अब वक़्त गुजरने पर एक अनुभव बन गया।
सिर्फ़ इसी बात को समझना इंसानों के लिए असंभव बन गया।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हिंदू एकता यात्रा में हल्ला था एक ऊंचेनीचे, सुरअसुर।
बात बेटी रोटी की आ गई तो जात पर आ गया ससुर।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अम्बेडकर अब भी कइयों के लिए नुमाइश भर हैं।
दिखा के फोटो महफ़िल में लौट के हाथ धो लेते हैं।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शिक्षा के तर्कों से अधिकार बताता मैकाले।
स्मृति वाले सन्न रह गए बाबा साहेब के साले।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कवच-कुंडल सूत-पुत्र, दान-वीर, अंग-राज, दंभो-द्भव का लक्षण।
दबी आवाज़ों को भी लिख दिया विदेशी आर्यावर्त का रक्षण।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
झूठ, फ़रेब, धोखा, छल, झांसा, कपट, ठगी की अदाएँ जांचिए।
अनपढ़ जाहिल भी रह गए तो तोते सा रट के कथाएँ बाचिएं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने बंदिशे खांसने, छींकने और सांस पर लेने पर लगा दी।
हुक़्म सिर्फ़ ये था कि हलक से आवाम की आवाज़ ना निकले।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सीमा पर सैनिक,अस्पताल में डॉक्टर और खेत में किसान क्यों हैं।
है अगर भगवान तो मंदिर में दान पेटी के साथ रहता क्यों है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सौ मीटर से ऊँचा होगा तो ही पहाड़ी कहेंगे।
बाक़ी हिस्सा अरावली का मेरे दोस्त का है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जड़ों को पानी देते हैं पर पत्तों को काट देते हैं।
ये द्विज वक्त पड़ने पर गोबर भी चाट लेते हैं।।

कल शाम नुक्कड पर बुद्ध मिले कहते थे,
शहर का नाम बदला, हार-जीत बदला अब नाम योजना का बदला।
हुक़ूमत ने सृजन नहीं किया बस मिटाने और पोछने में कायम रहे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चमचों को, चाटुकारों को,त्रिवर्ण को आज भी गुरु बढ़ाता है।
रोज़ कोई द्रोणाचार्य किसी एक एकलव्य का अंगूठा चढ़ाता है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत नहीं मानती प्रदूषण यहां कोई टेंशन है।
ये पहाड़ कूड़े के नहीं अरे दिल्ली हिल स्टेशन है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ज्याँ द्रेज़ के नरेगा को बदल नाम बना दिया था मनरेगा।
अब जी राम जी, हुक़ूमत के मन में फ़िर भी अखरेगा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अहमद को लिखी चिट्ठी रीना ने तो विवाद हो गया।
अनपढ़ कट्टर लोग चिल्ला रहे लव जिहाद हो गया।।






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