कविताएं

            यादे मिटाती हुकूमत 

यादें मिटा रही है ये हुक़ूमत दलित और गरीबों की
झूठ गढ़ लिखते हैं कहानी मूर्ति और कुलगीत की।
चिल्ला कर हितेषी कहते हैं ख़ुद को भरे बाज़ार
शिक्षा के मंदिर में भी नहीं परवाह इस तकलीफ़ की।।

नस्ल दूर होगी इतिहास से गरीबों और मज़दूर की 
नई दुनियां में कर इल्म से चलेगी सिर्फ़ राजा की ।
पता भी नहीं चलेगा ना चुभेगी गुलामी हमको
ना रात होगी ना दिन होगा गर भूलें बात तारीख़ की।।

झूठ लिख कर बुलवातें हैं वो तुम्ही से हालत की
गीतों मे छिपा लें संघर्ष और महक बगावत की।
फ़िर कहते हैं कि ये जन्म पुराने की दास्तां है
बुद्ध को ख़ुद ही का अवतार कह बात जम्बूद्वीप की।।

बुत देखा कल जिसकी इन्होंने बहुत बुरी हालत की
आधा वक्ष दिखता पहनावे में महाराष्ट्रीयन आदत की।
शिक्षिका थी पहली वो इस प्रधान पुरुष समाज में
हुक़ूमत चाहती है कि ना रहे याद भी विपरीत की।।

ये रोज़ गातें है लिए झूठे पुलिंदे और आवाज़ ज़ोर की
तुमसे भी गवातें हैं और चलती है यहां अब मुँहज़ोर की।
तुम्ही मान बैठे है कि तुम अब बचे नकारा हो
संस्थाओं में झूठ पिलाएं आवाज़ में कुलगीत की।।

फ़िर भी हम याद रखेंगे हर बात कटे नाक और स्तन की
टैक्स की,नांगेली की,शम्बुक की, औरत और मजदूर की।
जब इतिहास सामने होगा तभी अब यह  पैसला होगा
हुक़ूमत के सभी हथकंडों में रहेगी बात मेरी तफ़तीश की।।
:राजीव

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नेता की गाड़ी बेलगाम सी चलती है रोड़ पे।
ड्राइवर भी जो चलाता है एक अलग चौड़ में।।
स्कूटी मेरी खौफ में चलती है देख कर।
जान की कीमत क्या है मेरी एक वोट छोड़ के।।
रौनक लगी है बाज़ार में पैसों को जोड़ के।
खरीदने को आतुर हैं लोग खड़े हैं मोड़ पे।।
घर में रोटी दाल नहीं सिर्फ़ कुछ प्याज़ बची हैं।
बेटी कहती है व्रत करेगी सहेलियों की होड़ में।।
सफेदी के पैसे नही हैं, लगाऊंगा अख़बार जोड़ के।
दीवारें घर की फूट रहीं जैसे एक शरीर कोढ़ से।।
अब जिंदगी में कोई देख दिखावा नहीं बचा।
हुक़ूमत कहे मुल्क में बढ़े अमीर इतने करोड़ के।।
आवाज़ आ रहीं हैं अख़बार से यह कान फोड़ के।
मुल्क बना रहा है रोज़ कीर्तिमान नए कोण से।।
पत्नी की सिसकियां अब हिंचकिया बनी।
बेटा मासूमियत से कहे माँ पीले पानी आसूं निचोड़ के।।

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