4 January to June 2021 (COVID Special)

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बदलना हालात को था पर बदल साल गया।
हैरान हूं लोग नाच रहे कि जैसे हो ये हाल नया।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वज़ीफ़ा ले के जो पढ़ता था साए में ग़रीबी के।
नौकरी लगने पर नहीं देता तवज्जों थे जो क़रीबी के।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शिक्षक कैसे शिक्षा दे जो शिक्षित हों सारे।
सावित्री फूले से सीखें जो शिक्षण करती बिन हारे।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
छिडक़ कर वो नमक चखने पर बैठा था लिए प्याला।
आंखों के आंसुओं को किसने फिर नमकीन कर डाला।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रगो में दौड़ने से मना करता है ये रुकने पे अमादा है।
लहू मेरा मुझी पे अहसान कर मज़बूरी जताता है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
खुदाई करलो कहीं तक तुम वहीं तक मुझको पाओगे।
झेंप अपनी मिटाने को मुझे उन दस में गीनाओगे।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बदायूं कैसे फरक़ दिल्ली से होता है समझिए।
मीडिया में ख़बर ग़ायब ख़ुद से ही परखिए।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ट्रंप भी सीखा दंगो को और सीखा हर एक दाव।
दिल्ली, जामिया, जे एन यू और भीमाकोरे गांव।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दीपक जले जो आप गर रखा तो थाल में सजकर।
नहीं तो बुत है सिर्फ़ पत्थर देखलो हर काल में चलकर।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दर्ज़ अल्फाज़ हैं आंखे ना मिलाई जाए।
इंसानियत किसी धर्म में ना पाई जाए।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वो उंगली आसमां पर जो उठी एक मगर तिरछी।
कर्म का जन्म के दंभ पर हथियार जैसे तेज़ एक बरछी।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
राष्ट्रवाद में राष्ट्र रहे फिर वाद की क्या सौगात।
राष्ट्र बना है "हम" से तो "मैं" की क्या औकात।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दलितों की जो समझेगा वो होगा तो बस दलित ।
बाक़ी तो आड़ में सेंकेगे रोटियां मतलबी मलिन।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
श्रृद्धा कहे मान जाओ जान के क्या कर लोगे।
विवेक कहे जानो पहले मान के क्या कर लोगे।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गुस्ताख़ इरादे मेरी औकात पे कुछ हैं भारी।
निगाहें दिखेंगी जब तक तमाशे हैं जारी।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शिकायत हुस्न को इश्क़ से रहती हरदम।
नाज़ों अदा उठाने में ना रहे कहीं कमतर।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गज़ब संसार की माया लाश को क़ातिल ये कहते।
नज़र मर्दों की गंदी है औरतों को पर्दे में कहते ।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पंचायत जब बनी गांवों में थे दबंग ही शामिल।
किसानों को कमेटी लग रही कुछ ऐसी ही आलिम।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ज़िन्दगी लंबी मिले ना मिले मिलनसार मिले।
दुख क्या है जब हर किसी को यहां प्यार मिले।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत के इशारों पर वो तोता बैठ सिर हिलाएगा।
अंदाज़ है उसे वो जगह राज्य की सभा में पाएगा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इंतज़ार तेरा आंखो में देखना मेरी।
इज़हार मेरा आंखों में देखना मेरी।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अल्फ़ाज़ किताबों में लिखे हैं जो लिए श्याही काली।
पढ़ लेना जैसे ख़िज़ां के बाद देखे बग़ीचा माली ।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धोने गया था पाप उफने नदिया बिन टोटी।
धुल ना पाया पाप लेकिन सफ़ा हो गई लंगोटी।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे
दुख मन में ही दबा हुआ और हल ढूंढ़ने बाहर जाएं।
जैसे ही बाहर जाएं दलाल मंदिर के चोले में पाएं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हक़ की आवाज़ अन्याय के खिलाफ उठाते बेज़ुबा।
मायूस की याद नहीं कम होगी नाम रोहित वेमुला।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
राष्ट्र में अपने कोरोना की दवाई बनाए साइंसदान।
शामिल सब मिलकर इसमें फिर गूंजेगा राष्ट्रगान।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
संघर्ष और षड़यंत्र में फ़र्क है ज़रा।
जहां एक ख़त्म हो ले दूसरा हवा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इतिहास नहीं जो बीता था ये तो बस गढ़ा गया।
झेंप मिटाने को जन्मों का तंत्र वीरों पर मढ़ा गया।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शराफ़त अब शरीफों की गिरेबान में झांके।
वज़ीर वो बन ही जाता है जो दे सके झांसे।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दान दिया था जिसने पहला ना पावे प्रवेश।
चाहे महिमा कैसी हो और कितने बदले भेष।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
क्रोध में बोले शब्द हज़ार फिर ग़लती करता कौन।
शब्दों से भारी है जग में एक शांत रहता मौन।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नोटिस उनको मिल गया जो रोपें गेंहू धान।
खबरी चेट के खंजर घोपें देश के खूँ से सान।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शौचालय को तोड़ रहे ले कर श्री जी का नाम।
शौच असुर भी अब मरा नया जुड़े आयाम।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ख़ुदग़र्ज़ कब किसे कहती है दुनिया ख़ुद नहीं जाने।
फिक्रमंद अब वो रहती है जब तक अपना नहीं माने।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बेनतीजा बात को माशाल्लाह बात कहते हैं।
मिलती तो आंखे भी नहीं पर मुलाक़ात कहते हैं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रहना पीछे भी आने के आगे का इशारा है।
"मैं" को हटा कर ये कहे ये पल "तुम्हारा" है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कल दिवस गणतंत्र है चलो एक बात करते हैं।
देखते है कल कितने अम्बेडकर को याद करते हैं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने कुछ सोच के अनहोनी को होने दिया यहां।
बग़ावत के बीज को किसानों में बोने दिया यहां।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
"शाम के समय" को ख़बरनविसों ने ख़बर पर इस तरह लिखा।
रात, दिन , बादल और किसी को पाकिस्तानी हाथ दिखा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने तवायफ़ से मुँहज़ोर कर कहा।
तू बेचे परिधान मैं बेचती संविधान यहां।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अंदाज़ ए गुफ्तगू हैं सिर्फ़ आंखो के दरम्यान।
ग़नीमत है निकलती नहीं आवाज़ की म्यान।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
देश, दिल्ली अलर्ट पर है ख़ुद भी करो सावधानी मैनेज।
पर सलाह मेरी मानो पहले देखो पूछते ख़बरी के मैसेज।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
किसानों के मुद्दों के लिए एक फ़ोन कॉल पर उपलब्ध।
फ़ोन कॉल किस कंपनी का ये जान हुए किसान तभी से स्तब्ध।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अभी भी क़ाबिलियत को मेरी वो ऐसे परखता है।
सुना है बारे में मेरे वो हर किसी को मेरा समझता है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नाज़िम ने कहा कि हश्र कहीं ऐसा ना हो जाए।
काग़ज़ पे लिख दूं बात जो ना मुंह से निकल पाए।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बजट यूं कहानियों का खुमार बन बचत चट कर जाएगा।
20 लाख करोड़ और केयर फंड के खर्च कौन बताएगा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
PF पर भी टैक्स लगाए ये कैसी है दरकार।
निजीकरण को और बढ़ाए चुपके से सरकार।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ये सड़कों पे कीले कैसे बिछाई ।
चीन आया क्या बॉर्डर पे भाई।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मौसम अब फिज़ा बदलेगा उघड़ती जाए है चमड़ी।
खुलेगी ख़ाल शातिर की जो जाड़ों में जाए थी अकड़ी।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ख़बरी पूरे धंटे भर रिहाना रिहाना करता रहा।
फिर दिखा के रिहाना वैश्विक षड़यंत्र कहता रहा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
काग़ज़ पर लिख के दी थी कैसे मेरे बारे में सूचना।
इन ज़मीदोज़ लाशों को उखाड़ के यह सवाल पूछना।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मंदिर बाहर यह लिखा ख़ुद ख़्याल रखे सामान का।
मंदिर अंदर यह लिखा ज़िम्मेदार कौन हालात का।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सड़ांध पतलून की उसकी दिलाए याद उसे गर कोई।
विदेशी बोल देता है जगे जड़ हो चुकी भक्ति चिर सोई।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुकूमत वसुधेव कुटुंबकम् कह टोके विश्व अराजकता ख़ूनी।
गर पूछे कोई हाल देश का कहे ये मामला है अंदरुनी।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कुदरत भी कद्र इन्सान से अपनी करवा के मानेगी।
आपदा प्रबंध कहते किसे ये दुनिया आज जानेगी ।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मुल्क़ और हुक़ूमत में एक फ़र्क़ है बड़ा।
हुक़ूमत जवाबदेह और मुल्क़ शान से खड़ा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लोक का तंत्र रहे सत्ता ना गाड़े रास्ते में आवाम के किली।
उठाते आवाज़ रहें आंदोलनी चाहे बुलाए कोई परजीवी।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ज़िक्र अदाकारी का किरदार के साथ किया।
गुज़र गया पर मेरे किस्सों में हर बार जिया।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ज़ुल्म सह लिया चुप रह लिया और बेबस हो गया।
कलम की मेरी स्याही क्या सूखी मैं बेदम हो गया।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अगर पीछे हटना ही मौसमी क़वायद की एक निशानी थी।
फिर ये कुछ ना खोने की बात दोहराने की अदा पुरानी थी।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
तेरी गठरी में लागा चोर सबूत प्लांट कर देगा।
तेरी हत्या कर खंजर तेरी ही गठरी में रख देगा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत का लोकतंत्र में खुदमुख़्तारी जमाल।
जवाब देती नहीं उल्टे पूछती हैरती सवाल।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धूप ने हवा और पानी से गुफ़्तगू की है।
हर धर्म से दूर रहने की जुस्तजू की है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इज़्ज़त से लाईन में लगा इंतक़ाम का इंतज़ाम किया था।
ख़ुद से बेबस ने आज मुहब्बत का इज़हार किया था।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत का सवालों से यूं आंख चुराना।
शहादत पे वही आंसू वही राग पुराना।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मुर्दा पड़े मुल्क में शाख हवा ले के हिल गई।
बस क़ातिल को क़त्ल करने की वजह मिल गई।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ये ना कहना कि इन्हे चलाना नहीं आता।
ख़ुद मान लो कि तुम्हे बनाना नहीं आता।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
औकात में रखने का ग़ज़ब फैसला लिया।
राज में शमशान भी दो हिस्सो में कर लिया।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
विचार मन में फंसा रहा सड़ गया पानी ठौर।
नाम परंपरा का लेकर लोग भोग रहें हैं रोग।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
एकलव्य ने भी सोचा होगा जब लिया अंगूठा मांग।
दंत कथाएं बने परंपरा, शोषक रचते हर पल स्वांग।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ख़ामोश हो रहीं है आवाज़।
ख़त्म होते सभी आग़ाज़।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ग्रंथ पढ़ा और रट लिया बिन लगा के अपनी अक्ल।
मिट्टी से राख़ पोत कर बदली इन्सानी शक्ल।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मन के रोगी को हवा ऊपरी अनपढ़ ही बतलाएं।
रोगी को किसी डाक्टर से जल्दी ही दिखलाएं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत के कारिंदे हुक़ूमत को बताते हैं।
ये ग़द्दार आदिवासी मुल्क अपना बताते हैं।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सच्ची बातें समझ में आती झूठी करती भेद।
सच्चे ही बाते याद रखें और झठे करते खेद।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
असहमति लोकतंत्र में लोक की रज़ामंदी में भी है।
रज़ा किसी की भी हो हक़ तो नापसंदी में भी हैं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शिलाजीत और अश्वगंधा मिला स्वर्ण भस्म खाई।
किताबी मूर्ख ना बन सके पिता ना उत्तेजना आई।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शरारत हुस्न की और इश्क की उम्मीद बंध जाना।
जैसे कागज़ पर कोरे बिखर साथ कई रंग जाना।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत अब नज़ाकत से लोगों को फुसला ही लेती है।
परंपरा के नाम पर धर्म और जात में उलझा ही देती हैं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ज़मीनी हक़ीक़त को वो दरकिनार करते हैं।
इंसान को वो हिंदू और मुसलमान कहते हैं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
भाषा कुछ ना कर सकी आवाज़ निकल ना पाई।
आंख से आंसू निकल पड़े फिर बात समझ में आई।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दिल दरिया सा बह निकला बंधन सारे तोड़।
सीधा सा एक रस्ता था ना था कहीं पर मोड़।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत दवा पर मनाएगी वाहवाही के चर्चे।
शर्तों के ऊपर शर्ते फिर रख दी नई शर्ते।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत से सवाल जो पूछा तो वो कहती हमे मक्कार।
जन से जंगल और ज़मीन छीन ली और कह दिया गद्दार।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत तारीख़ को मंहगाई की कीमत कहती।
बच कर निकलने में परछाई सी नियत रहती।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत कहे शायर से झूठे क़सीदे भी तू लिख।
दिल की रज़ा हो ना हो खुश हमेशा तू दिख।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वर्दी पहन खड़ा हुआ मौके के एटीएम के पास।
चालान सड़कों पर काट रहे और रिश्वत की दरकार।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
माननीय को चस्का लग गया माई लॉर्ड बन जाने का।
बलात्कार के अपराध को समझे हक़ औरत को पाने का।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत से बनाए रखना झूठे स्तुति गान गाए चलना।
अनुराग में सवाल ना पूछो बस भक्ति में समाए रहना।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जन्म के झूठे दंभ को भेदती ज्ञान की गहरी बरछी।
वो एक उंगली बुत की आसमां पे उठी है मगर तिरछी।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मर्यादा को मर्द निभा रहे बिन लगा के अपनी अक्ल।
शोषण करते रात दिन औरत की देखे केवल शक्ल।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
विजेता वो है नहीं जो दे हरा और गाए मौत के गीत।
है जो शांत रहे और क्षमा कर दुश्मन को भी ले जीत।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अंतराष्ट्रीय महिला दिवस मनाते नारे लगते शान से।
मंच पे सारे मर्द खड़े पर कहते भारत माता शान से।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वो तमाशा तब करेगा जब करेगा मंहगाई बढ़ाने को।
झूठे क़सीदें सफ़ें होंगे मुझे चापलूस रौशनाई हटाने दो।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मैं पलटता हूं उन्हे वो पलटती नहीं ये दास्ताँ ही है।
मैं अकेला नहीं हूं ये मैंने किताबों से राब्ता की है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सींचता भी है तू इन फूलों के रंगो के देख कर।
बाग़बान बता चमन कैसे महकेगा ये भेद कर।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नेता को इतना मुश्किल भी नहीं इंसाँ को इंसाँ कहना।
ख़ुद कोबरा बनके शमशान कहे और मेरा हैराँ होना।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जानती हैं दरख़्तों की टहनियां हैं जो कच्ची मुड़े हुए।
ज़िंदा तभी तलक वो जब तक हैं ज़मी से जुड़े हुए।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ख़ुश्क क़िताब को क़िताब से ही हराया जाता।
लिखना था तो इंसान को इंसान ही बताया जाता।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ग़म और खुशी के फ़र्क़ में मसरूफ़ हो गया हूं।
ये दोनो ही जो ना हों वहीं मशग़ूल हो गया हूं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमती प्रोत्साहन पा पैसे ले कर भागे चंद भगोड़े।
बैंको की बैक टूट गई बिक जायेंगे जो बचे है थोड़े।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हरगिज़ नहीं है बचेगा दहशत का तलबगार।
मंज़ूर करेगा कैसे मुल्क़ ख़ौफ़ की सरकार।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मयस्सर अब नहीं वो प्यास जो कोई मंदिर बुझाएगा।
जहां भेद इंसानों में हो वहां भला क्यों कोई जाएगा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रिवायत कहो या संस्कृति हैं गुलामी की निशानी।
खड़ा पानी ही सड़ जाए ये कहावत भी है पुरानी।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
आंतो में फंसा छाती में जिंदा रहने तक धड़कता है।
यकीं हो ना हो पर लालच में पहले ये ही मचलता है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मासिक धर्म नाम दिया पाबंद मंदिर, घर और चौका महिलाओं का।
मूछें उगती तो गर्व दिखाता मर्द अपने को शहरों, कस्बों, गांवों का।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पहले जो जीते वो राजा बनता जो हारे वो दास।
अब जो पढ़ें वो इंसा बनता जो अनपढ़ शैतान।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लूट ले अस्मत क़त्ल करे कहते उसको डकैत।
मंच से मंत्री जात बताए हम कहेंगे उसे बकैत।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ख़बरों की आब क्या है, क्या इनका जमाल है।
ख़ुलासा ख़बरनवीस का अब तकिया-कलाम है।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वो जो गैर हैं यहां कहें हम ग़रीबो के साथ है।
पर ग़रीबी बनाने में भी इन्ही गैरों के हाथ है।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हंस कर कहें या रो कर ये नेता का ताव है।
बेहयाई से कहे महिला दिखाती ये पांव है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
फिर लिए याद क़त्ल की करता यह एक त्यौहार आया है।
ज़िंदा जलती जान देखने घरों से इंसान तैयार आया है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
झूठों के मसीहा ने कई अमरकथा लिखवाई।
बेशर्म की हद ना टूटी अब हद भी है शरमाई।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
किसी फिर बात पे किसी एक शाम अचानक याद आया।
ताना तरकश सा चुभा था दिल पे, अब दिल से धन्यवाद आया।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सिरफिरी बातों से वो आज़माना जानता है।
अक्ल वालों को ढूंढ कर मारना चाहता है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लोक कहानियां बन वो अक्ल पर पसर जाती हैं।
हत्याओं का मंजर भी त्यौहार सा दिखलाती हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ख़ुद ही पे रंग लगाया अब ख़ुदी से शिक़ायत।
नाफ़रमानी बुतों से है फिर करते है ज़ियारत।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रवानी इस जवानी की देखिए ढाए क्या गज़ब।
किस्सों के हर्फ़ हैं आदिल,आब,अब्द और अदब।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धुआं होने की फ़ितरत थी लगा पर होने को काबिज़।
नफरतें बांट कर बैठा ख़ुद कहे अपने को क़ाबिल।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
उसका मक़सद ही था हिंदू और मुसलमां करना।
भूख और इल्म का मज़हबी दंगो में तर्जुमा करना।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नक़्शेबाज़ी भी अब EVM चुनाव में करने लगा है।
खुल्लम-खुल्ला नेता की गाड़ी में सफ़र करने लगा है ।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कर्तव्य में आनंद लीजिए अहसान नहीं करना।
जितनी प्यास हो उतना पीना कभी नहीं भरना।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
एक दरगाहों पर जा कर चादरें मंहगी चढ़ाता है।
दूसरा चढ़ी चादरों को बेच कर बच्चे पढ़ाता है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
देर इंसान की फ़ितरत है।
तो ख़ुदा एक हिकमत है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वज़न इस बात का कि बात दिल पर भी असर करे।
बहस किस बात की जो घात बातों पर नज़र करे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रखे है बेवजह मुझसे तकल्लुफ़।
नहीं मेरा ग़लत कोई तलफ़्फ़ुज़।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
उसकी रज़ा मेरी ख़ता मिलती सज़ा।
मेरा मज़ा उसकी अदा किसकी क़ज़ा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इम्तिहान वो मेरा लेते हैं बिन बयान के।
एहतेराम तो करते है पर बिन ज़बान के।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नेता हांके देखो ये चींटी भागी ले पीछे हाथी को साथ।
प्रेस दिखाए साइकिल सबूत में जिस पर चींटी का था हाथ।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दिलकश अंदाज़ थे उसके आंखों में रौशनी थी।
जब ज़िंदा थी उसके सर पर मेरे नाम की ओढनी थी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अंदाज़ा हमको भी था क्यूं रहे थे हम अंधेरे में।
करवटें बदलते रहे रात भर जल्दी में सवेरे के।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
उसकी रज़ा मेरी ख़ता मिलती सज़ा।
मेरा मज़ा उसकी अदा किसकी क़ज़ा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत नशे में थी साल फिर कोरोना को एक हो गया।
अपने पोस्टर सजाने के सिवा बोलो उसने क्या किया।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कुंभ के अखाड़े अलग रहे क्या तबलीग़ी जमात से।
मीडिया बगले झांक रही है उत्तर में इस सवाल के।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ख़ुद प्रतीकात्मक है बस जलती लाशे सच्ची।
कर्फ़्यू में आवाज़ दब गई कुछ छोटी कुछ कच्ची।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
तिफ़्ल घुटनों के बल चला था पर चला तो सही।
शहसवार निकला गुलाम कहीं पहुंचा ही नहीं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत लोगों से वोट लेकर भी ख़ुद परेशान।।
दवा, ऑक्सीजन, बैड और अब शमशान।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मौका छोड़ता नही प्रचार में अपना फोटो लगाने का।
शमशान बाक़ी है जहां कफ़न तैयार चेहरा सजाने का।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ख़ता अब दे बता कब तलक आपदा में अवसर खोजेगा।
नफ़रतों की फ़सल तैयार देखें अब ये ज़मीं पर क्या बोदेगा।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रसूख़ जिनका है ज़िंदा ऑक्सीजन पर वही लोग आएंगे।
नेता आम लोगों को सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट पढ़ाएंगे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जूं भी नही रेंगती कान पे मोटी चमड़ी के ढीठ नेता की।
तिनका उलझने को दाड़ी में चोर की बुरा मान लेता है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अक्ल मंद आंख मूंदी ज़बान मंदी है पर दुःखी दिल समझता है।
आपदा में अवसर ढूंढता वो व्यापार सांस का भी करता है।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत को अपना जाल ही शिकंजे सा लगा।।
होते ही लाइव हमाम ख़ुद नंगा नज़र आने लगा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
एक लाश ने एक शव को एक मुर्दे के सामने कहा।
एक साल था पास उनके हमने क्यों खोया ये जहां।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लाश उठाते कंधों की शिक़ायत है।
आखें आंसुओं को कैसे सुखाती हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत बीमारी को नहीं बीमार को रस्ते से मिटाती जाए।
बानगी मौजूदा क़त्लेआम की कुछ इस तरह कही जाए।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
विश्वगुरु की बातों से रिसता सांस का झूठा झरना निर्झर।
आत्मनिर्भर बनना था अब ख़ुद क्या आत्मा भी है निर्भर।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ज़िम्मेदार ना ले कभी लेती सिस्टम के घूंट।
अब सोचे पल में प्रलय होगी मुल्क लूट सके तो लूट।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रसूख़ जिनका है ज़िंदा ऑक्सीजन ले वही लोग जाएंगे।
नेता आम लोगों को सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट पढ़ाएंगे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमती आँकड़े बता रहे अभी हद में है बीमारी।
जलती चिताएँ बयां करें अब कम्युनिटी स्प्रेड है जारी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हौसला डूबे दिल को दिया किया दिमाग़ ने दख़ल।
मौत आनी तय है पर बक्त और बहाने बदल बदल।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत जानती है किसे कब्र और शमशान कहते हैं।
यूं ही नहीं इस को मज़हबी सरकार कहते हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ऊटपटाँग बातें कर वो सब कुछ उलझा है देता।
बदकिस्मत आवाम हैं जिसने ढूंढा ऐसा नेता।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत इंतख़ाब में हुक़ूक़ को मतों से तौलती है।
सोचती है मुल्क की आवाम चंद मोलकी है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सुपर गुंडई की लिए आरज़ू नशे में याद पुरानी लेगी।
विराट रूप देखने की ललक होश में नहीं आने देगी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
उफ़ ज़ुल्मत हुक़ूमती इदारा खेलता जिंदगी का जुआ।
मैंने सामने देखा है लोगों को तड़फ कर मरता हुआ।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत चमकाने की ब्रैंड फिराक़ में है।
बहाने ढूंढ रही वो अभी हिज़ाब में है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
समझना नहीं चाहती बीमारी में साथ मेरे रहने की बात है।
ख़ुदा से कहीं ऊपर हर माँ की ये और बात है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत की नपुंसकता है छाती छप्पन इंची शेर की।
पहली वेव दूसरी वेव और अब बात तीसरी वेव की।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने बेशर्मी से मौत की जवाबदेही में कहा।
अश्कों से तेरी आखें तो हुई साफ़ ये क्या कम रहा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सपना दिखाए बुलेट ट्रेन का पर नहीं मिलती एंबुलेंस।
मन की बातें पढ़ नहीं बाते बस सुनते जितनी सेंस।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत हत्या को मुक्ति कहे जा रही हैं।
लिए लाशें वो नदियां बहे जा रहीं हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रवायत है मुल्क की ये मौत में भी किस्म के त्यौहार ढूंढ लेता है।
बचने में जिम्मेदारी से एक ख़्वाब झूठा ख़्याली अवतार लेता है।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत हरक़तें तो बहुत करती है हिक़ारत सिखाने की।
देश फिर लिखेगा ताबीर बस देर है सिस्टम मिटाने की।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मैं सो गया फिर चादर ने चुपके से तकिए से कहा।
इसे कुछ हो गया तो छोड़ना पड़ेगा हमें ये मकां।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इश्तहारों की बानगी में मुल्क दिखेगा।
जो कुछ है अच्छा वो अब सब बिकेगा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे
इस बरस छोटा है क़िला लाल तक़रीर कुछ ऊंची चाहिए।
बोले गर मीनार क़ुतुब से तो उसे मुल्क की तक़दीर मानिए।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने की है कोको युक्त डार्क चाकलेट लेने की अनुशंसा।
दिन वो दूर नहीं जब होगी टीके के बजाए गोबर से स्नान की मंशा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मुल्क के बाशिंदो से ही पहचान का तकाज़ा करना।
इस बरस मेरी तरफ़ से सभी को चाँद मुबारक अता करना।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत काल में ये सवाल पूछने पर तुष्टि नहीं करती।
आंकड़े लाशो के पूछने पर संख्या की पुष्टि नहीं करती।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नेता दार्शनिक बात कहें बोले है कोरोना का अधिकार।
बहरूपिया बोल के बांचें सस्ते ओछे सड़े गले संस्कार।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
फ़िक्र है फ़न है फ़रियाद की फ़ितरत भी।
मेरे शेरों में मिलेगी फ़र्मान की ख़िलाफ़त भी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वो तब से है यहां पर जब तू था भी नहीं यहीं।
गज़ा कहे हक़ दिखाता जहां थी मेरी ये जमीं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ग़ैर-ज़िम्मा-दारी से कहता है कि कोरोना से जो मर गए, वे मुक्त हो गए।
बेशर्म को याद नहीं जो मर गए बे सांस जवां उम्र के इंसान नए।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लाशे उठ कर मांगेगी हक़, मागेंगी अपनी गरिमा।
बालू को हवा उड़ा ले गई उघड़ के हो गई बेपर्दा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ख़ुद से सबकी ख़ुदी ले रहे उनको करती परेशान ।
बैठ हुक़ूमत तड़ी जमाती ना ख़ुद करती है काम ।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बादकशों सत्ता के पहले कह दूं ख़्याल रहे फ़िर बाद में।
फर्ज़, वफ़ा और ज़बा रहे सदा मज़लूमो के साथ में।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
फैफड़ों ने शायरों से एक जायज़ शिकायत की है।
दिल के सिवा उन पर भी लिखने की हिदायत दी है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत कहती है नुक्ता लगाया लिखने में वो नहीं जायज़।
ये अर्ज़ियाँ लौट के शिकायत की बन जाती हैं नाज़ायज।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत स्वांग रचती है कि मुद्दे ये बिखर जाएं।
साबित करने को झूठ, झूठें चिल्लाते हुए गाएं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हॉंगकॉंग तो रूठ गया पर चुप है नाइजीरिया।
गंगा का पानी पीना था पर भांग ज़्यादा पीलिया।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रूंधे गलों की ग़ालिबन तस्दीक़ क्यों करें।
बैठा है वो ये सोच के कि रोकर दिखाना है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
उश्शाक़ तर्जुमानी में वज़ीर को ही मुल्क कहेगा।
मुल्क ज़िंदाबाद पर वज़ीर साल बस पाँच रहेगा

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सात साल और जश्न नहीं, क्या ये अहसान हुआ।
ख़बर देख टीवी पर ये मन आज फिर परेशान हुआ।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दिल मेरा ख़बर मौतो की नही लायक जो अब सहले।
कलेजा थाम लेता हूं ख़त का लिफ़ाफ़ा खोलने से पह

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
टैक्स कंसंट्रेटर पर लगा दिया हाए ये कैसी है बात।
जनता मर रही ये लगाए आपदा में अवसर की घात।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सभी चिकित्सीय प्रणालियों में हो निहित वैज्ञानिक ज्ञान।
पालन और कोशिश करें तो बचे मरती इंसानी जान।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत को जब मौतों पर लोगों ने जवाबदेही में रगड़ा।
देख इशारा शुरू हुआ आयुर्वेद और एलोपैथ का झगड़ा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मान गए जो कह दिया क्यूं ना जाने ये दुनियादारी।
आँख पे पट्टी बांध कर क्यूं सारे बन गए गांधारी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लाशों से कफ़न खींच के वो पाएंगे क्या।
बेशर्म हो के शमशान छिपा पाएंगे क्या।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वात, पित्त, कफ के असंतुलन में ये चिकित्सा होती सही।
गेरूए कपड़ों को पहने कोई भी बाबा आयुर्वेद नहीं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हारी पहली लहर दूसरी लहर ये सिर्फ़ एक हवाबाज़ी।
हुक़ूमत मजबूर होकर सफ़ाई में करती ये कलाबाज़ी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हो बीमार कर टोने टोटके, यज्ञ हवन, मंत्र और पेड़ के नीचे सोते।
अक्ल लगाए बिना आज ज़िंदगी ख़ुद और औरों की खोते।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सुना है अख़बार ने हुक़ूमत को जमाने में किया एक सर्वेक्षण।
चौथा स्तंभ बेपरवाह बन अमादा करे चाटने का अन्वेषण।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
क्या होगा गर एक सवाल पुरानी संस्कृतियों पर हम पूछे।
सूरज, जानवरों, नदियों, पेड़ों और आपदाओं को क्यों पूजे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत करेगी अगले चुनाव में ये पैंतरा भी इख्तियार।
मेहुल भाई का चोटिल फोटो है बस ख़ालिस इश्तिहार।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
क्या मानव आयोग लेगा संज्ञान राष्ट्र स्तर पर हुई इंसानी मौतों का।
लाशें जिनकी जानवर खा गए और आँखे खो कर रोतो का।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
विज्ञापन एक देख रहा हूं जहां लोग मिलेंगे माहिर।
शक्ले जब उनकी देखी तो देखा थे सारे वो शातिर।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लगाना मुंह पर था जिस मास्क को वो आँखों पर लगा के किसे झूठें बचाते हैं।
वो ज़िंदा थे,लाशें बने,बन के दबे,दब के बहें जिन्हे वो जल समाधी में बताते हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हिसाब हमने लगाया है लोगों के फिसलते ज़मीर पर।
निगाहे आसमान में रखें और चलते बेमन ज़मीन पर।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ब्लू टिक का ही मसला था और बैठ ख़बरी गया शाम को लेकर लोग चार।
लहर, फंगस, रोज़गार, भूख, शिक्षा, दवाई, असमानता की भूले हैं मार।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लिए ग्लोब बीच में पानी लोटे से मिलकर उस पर चढ़ाएं।
ऐसे बाबा ही पृथ्वी को शीतल करने में हमको मुर्ख बनाएं।।


कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थ
लापरवाही मत कीजे ना रहिए हुक़ूमत के भरोसे कोई।
जो अभी होकर यहां से गई वो मौत अभी तक नही सोई।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मुख़ातिब होने की सनक में वो ये भी भूल जाता है।
बोलना मौतों पर था ऑक्सीजन पर बोल जाता है।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कव्वों को पूर्वज मानेंगे गाय को कहते मां।
इंसानों को दुत्कारेंगे ना समझे उनमें जां।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हिज्र के वो पुराने दिन हमारी हिम्मत बढ़ाते थे।
कुफ़्र कोई बेजा नही ख़ुदा ख़ुद ही बताते थे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
"तो क्या होता" तर्ज़ देखिए डराती अदा के साथ।
भक्ति देख ये करवाएगी चाहे हो ना रज़ा के साथ।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रिश्ता यूं ही अगर निभता है तो उसमें हैरत क्या।
मैं उसका हूं, उसे नही पता तो इसमें ग़ैरत क्या।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सरसों बोले पेट्रोल से अब दिन बच गए हैं थोड़े।
ये दो और वो दो ही खा पाएंगे तले हुए पकौड़े।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत भी नहीं चाहती बीते दिनों हुई मौतों का तथ्य।
आंकड़ों का पर्दा डाल कह दिया झूठा अंतिम सत्य।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जो बीत गया सो बीत गया जो होगा वो होगा ही।
ना पछतावा ना ही चिंता वर्तमान में खुश होना जी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मर्यादाओं की झूठी ज़िद में ये मर्द बने आतताई।
बाप बने, बेटे बने, पति बने और बने भाई।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चंपक चपत लगाएगा और आड़ में होगा ट्रस्ट।
राम के नाम पर खा गए ये निकले कितने भ्रष्ट।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ताक में है शिक़ायतों को कैसे भुलाया जाए।
सोचे कैसे कोई मुद्दा धर्म का फिर से उछाला जाए।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ख़बरियों की यूं ही नहीं तरफ़दारी में।
ये अब कुत्ते नही इंसान पालते है वफ़ादारी में।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सरकती गुंजाइश जेल से बाहर निकलती हैं ज़रा देखिए तो।
कौन कहे आवाज़ ख़ुदा तक पहुंच नहीं पाती, ज़रा भेजिए तो।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
फरसा दे दिया हाथ में तीर के साथ थमाई चमकती हुई तेज़ तलवारे ।
ना जाने किस डर की मंशा से मन ने मान लिया, हैं ये अस्हाब हमारे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बता दे ज़मीनो में डाला था क्या जो बिकने में सोना उगलने लगीं।
दस्तावेज़ों की महक में ये बू कैसी है
धुआं दे दलाली जो सुलगने लगीं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गांव में कुआं, कुएं पर चौहद्दी, चौहद्दी का सिपाही, सिपाही की निगाहें।
पीना तो दूर पानी पास परछाईं पड़ने पर भी मिलती भी किनको सजाएं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सहूलियत उन्हें भी रहती है मुझे भी।
चांद उनको भी दिखता है मुझे भी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चस्पा है तेरा चेहरा शहर के हर मोड़ पर क़ातिल।
नज़र आता नहीं इनको ये डर से आंखें मूंद लेते हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धर्म ने धारण करवा दिए पत्थर में भगवान।
पर ये ना हो सका कि माने सबको एक इंसान।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमती इश्तिहार में मुफ़्त दवा की बात कैसे सही जाए।
नाज़ायज है अगर कोई बात तो जायज़ कैसे कही जाए।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मैं सबसे पहले उसे ही अपने पास से दूर भगाता हूं।
जो ये पूछे कि मैं अपने नाम के बाद क्या लगाता हूं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जो पढ़ने के लिए डोनेशन पब्लिक स्कूल में देते हैं।
उम्र सारी दी डोनेशन पब्लिक से रिश्वत में लेते हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
महोदय का टैक्स कटा और खोल दिया पूरा महीना।
सोच समझ कर बोले आप जो बनी रही पूरी महिमा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मिली अपाहिज़ को बैसाखी उसने उसको थाम लिया।
ठीक हो गया फिर भी उसको शरीर का अंग मान लिया।।






























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