2 January to June 2020
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बेतकल्लुफी अब मेरी बेहयाई लगने लगी।वो तो सड़को पे जगे, सोने में घर मेरी रात गई।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
खुदमुख्तार सद्र है तो कलम में लाल श्याही डाल लो।
हुक़ूमत ज़ुल्म कर नही सकती गर ये बात मान लो।।
खुदमुख्तार सद्र है तो कलम में लाल श्याही डाल लो।
हुक़ूमत ज़ुल्म कर नही सकती गर ये बात मान लो।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कागज़ ढूँढा नही मिला अब कौन करे पहचान।
है कौन मुझे जो रोकेगा जब गाऊँ राष्ट्र गान।।
कागज़ ढूँढा नही मिला अब कौन करे पहचान।
है कौन मुझे जो रोकेगा जब गाऊँ राष्ट्र गान।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ना पत्थर पूजे हरि मिला ना खुदा ने सुनी अवाज़।
स्वार्थ की सिद्धि कर रहे पंडित मौलवी की जमात।।
ना पत्थर पूजे हरि मिला ना खुदा ने सुनी अवाज़।
स्वार्थ की सिद्धि कर रहे पंडित मौलवी की जमात।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सर्दी की खुली धूप में घर के आंगन में लेटकर।
ज़ुल्फो में रहूं गुम तेरी ख़ुद अपना आप भूलकर।।
सर्दी की खुली धूप में घर के आंगन में लेटकर।
ज़ुल्फो में रहूं गुम तेरी ख़ुद अपना आप भूलकर।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बमुश्क़िल रोक पाता हूँ लहू दिल से जो रिस्ता है।
रात जो उस हुए घायल, वहां पढ़ने का रिश्ता है।।
बमुश्क़िल रोक पाता हूँ लहू दिल से जो रिस्ता है।
रात जो उस हुए घायल, वहां पढ़ने का रिश्ता है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
फ़िरक़ों में बंट गए हैं नाम पीछे जाति को जोड़कर।
किस मुंह से कहते है एक बनो जाति को तोड़कर।।
फ़िरक़ों में बंट गए हैं नाम पीछे जाति को जोड़कर।
किस मुंह से कहते है एक बनो जाति को तोड़कर।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सोने से पहले कान में लेटे हुए बिटिया ने यह कहा।
पापा सपने में साथ चलना लगे अकेले डर वहां।।
सोने से पहले कान में लेटे हुए बिटिया ने यह कहा।
पापा सपने में साथ चलना लगे अकेले डर वहां।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
फ़िल्मो की एक छाप से ही मुद्दा मारता है ज़ोर।
बाज़ार में बरेली का इतिहास भूल झुमके का है शोर।।
फ़िल्मो की एक छाप से ही मुद्दा मारता है ज़ोर।
बाज़ार में बरेली का इतिहास भूल झुमके का है शोर।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गुंज़ाइश अब नही महफ़िल में रंग अब जम ना सकेगा।
हुस्न तवक़्क़ो खोज लेगा पर इश्क अब हो ना सकेगा।।
गुंज़ाइश अब नही महफ़िल में रंग अब जम ना सकेगा।
हुस्न तवक़्क़ो खोज लेगा पर इश्क अब हो ना सकेगा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सलामत रोज़गार रहता तो क्या डर था बिछड़ने का।
अभी लौटा हूँ गांव से मुझे डर है आदत बिगड़ने का।।
सलामत रोज़गार रहता तो क्या डर था बिछड़ने का।
अभी लौटा हूँ गांव से मुझे डर है आदत बिगड़ने का।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बर्फ सरीखी यादें तेरी जाड़े के मौसम में ही आएं।
दोष नहीं मेरा कुछ इसमें हम ख़ुद को यूँ समझाएँ।।
बर्फ सरीखी यादें तेरी जाड़े के मौसम में ही आएं।
दोष नहीं मेरा कुछ इसमें हम ख़ुद को यूँ समझाएँ।।
कल शाम नुक्क्ड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत लाचार के आँसू में भी क़ामयाबी ढूंढ़ लेगी।
देगी सामने सबके पर अकेले में जाकर लूट लेगी।।
हुक़ूमत लाचार के आँसू में भी क़ामयाबी ढूंढ़ लेगी।
देगी सामने सबके पर अकेले में जाकर लूट लेगी।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
डूबी मेड़ों में जब पानी खेतो की ज़ानिब चले।
तब मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू उठे और जन्नत वहीं लगे।।
डूबी मेड़ों में जब पानी खेतो की ज़ानिब चले।
तब मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू उठे और जन्नत वहीं लगे।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मानो मत जो कह दिया तुम अक़्ल लगा के जानो भी।
बुद्धि का उपयोग करो ख़ुद जांच परख के ठानो भी।।
मानो मत जो कह दिया तुम अक़्ल लगा के जानो भी।
बुद्धि का उपयोग करो ख़ुद जांच परख के ठानो भी।।
कल शाम नुक्क्ड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गुरुजी बोले मुद्रा सुधरेगी गर चित्र कर दो चेंज।
छापे खाने आबाद तभीसे पढ़ना छोड़ रहे हैं फेंस।।
गुरुजी बोले मुद्रा सुधरेगी गर चित्र कर दो चेंज।
छापे खाने आबाद तभीसे पढ़ना छोड़ रहे हैं फेंस।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दफ़्तर से लौटा तो कोड मेरे घर में कंडक्ट हो गए।
सुना कि बिरयानी और लड्डू सांप्रदायिक हो गए।।
दफ़्तर से लौटा तो कोड मेरे घर में कंडक्ट हो गए।
सुना कि बिरयानी और लड्डू सांप्रदायिक हो गए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हद-अनहद को पार करे वो बेहतर विद्यापीठ।
उस्ताद वही कहलाते करते ज़िद को ऐसी ढीठ।।
हद-अनहद को पार करे वो बेहतर विद्यापीठ।
उस्ताद वही कहलाते करते ज़िद को ऐसी ढीठ।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
किवाड़ के बाहर वो था अंदर हम थे समझ गए क्या खेल।
आवाज़ दबेगी अंदर जितनी-उतनी चीखें होंगी तेज।।
किवाड़ के बाहर वो था अंदर हम थे समझ गए क्या खेल।
आवाज़ दबेगी अंदर जितनी-उतनी चीखें होंगी तेज।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जादूगर हैं कपड़ों और पोहे से पहचान जाते हैं।
नज़र रखते हैं ग़ज़ब,क्या पहनते, कैसे खाते हैं।।
जादूगर हैं कपड़ों और पोहे से पहचान जाते हैं।
नज़र रखते हैं ग़ज़ब,क्या पहनते, कैसे खाते हैं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
द्रोपदी ना आंसू रोए और ना एकलव्य अंगूठा खोए।
भारत में संविधान लागू साल इख्त्तर अबतक होए।।
द्रोपदी ना आंसू रोए और ना एकलव्य अंगूठा खोए।
भारत में संविधान लागू साल इख्त्तर अबतक होए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
फक़त इतनी तमन्ना है कि बस एक दीदार हो जाए।
ना मालूम नज़र कब वक्त के साथ मिट्टी सी हो जाए।।
फक़त इतनी तमन्ना है कि बस एक दीदार हो जाए।
ना मालूम नज़र कब वक्त के साथ मिट्टी सी हो जाए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
महाराजा एयर इंडिया वाला करे बिकने का इंतज़ार।
देश नहीं बिकना था बोला, फिर ये कैसा इंतजाम।।
महाराजा एयर इंडिया वाला करे बिकने का इंतज़ार।
देश नहीं बिकना था बोला, फिर ये कैसा इंतजाम।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पत्रकार कुछ भांड बने और भांड बने कुछ नेता।
बिकते हैं दो कौड़ी में और फिसले जैसे रेता।।
पत्रकार कुछ भांड बने और भांड बने कुछ नेता।
बिकते हैं दो कौड़ी में और फिसले जैसे रेता।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
प्रदर्शन का ये झगड़ा कैसा, कैसी है रुसवाई।
संसद गर चुप बैठे, है फिर सड़कों पर सुनवाई।।
प्रदर्शन का ये झगड़ा कैसा, कैसी है रुसवाई।
संसद गर चुप बैठे, है फिर सड़कों पर सुनवाई।।
कल शाम नुक्क्ड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
भय ने ही भगवान जना धंधे ने जन दिया धर्म।
रोज़ लड़ाई रोज़ तमाशा आग उगलता मर्म।।
भय ने ही भगवान जना धंधे ने जन दिया धर्म।
रोज़ लड़ाई रोज़ तमाशा आग उगलता मर्म।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
प्रीत तेरी पे वांरा जाऊँ हँसी पे तेरी बलिहारी।
मुस्काती गुड़िया मेरी तुझे लगे उम्र मेरी बाक़ी।।
प्रीत तेरी पे वांरा जाऊँ हँसी पे तेरी बलिहारी।
मुस्काती गुड़िया मेरी तुझे लगे उम्र मेरी बाक़ी।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अर्थशास्त्री फेल हो रहे GDPगिर गई औंधे मुँह पांच।
LICभी शायद लेने जाएगी रिलाइंस से बीमा आज।।
अर्थशास्त्री फेल हो रहे GDPगिर गई औंधे मुँह पांच।
LICभी शायद लेने जाएगी रिलाइंस से बीमा आज।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
संयोग नही प्रयोग है, गोली मरवाने का उपयोग है।
अमन शांति कैसे हो जब धर्म-जाति का मनोरोग है।।
संयोग नही प्रयोग है, गोली मरवाने का उपयोग है।
अमन शांति कैसे हो जब धर्म-जाति का मनोरोग है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सवालों में ना सिर्फ धुआं हो ख़ुद अंगार से तपो।
लोकतंत्र बना रहेगा गर सवाल उठाते हुए चलो।।
सवालों में ना सिर्फ धुआं हो ख़ुद अंगार से तपो।
लोकतंत्र बना रहेगा गर सवाल उठाते हुए चलो।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बस स्टैंड पर खड़ा सवेरे, थे स्कूल के बच्चे साथ।
बस वाला ना रोके बस, सोचे फ्री के होंगे पास।।
बस स्टैंड पर खड़ा सवेरे, थे स्कूल के बच्चे साथ।
बस वाला ना रोके बस, सोचे फ्री के होंगे पास।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कलम की नोक ने चाकू की नोक से कहा हैं।
छूने की अदा छोड़ के फर्क हममें कहां हैं।।
कलम की नोक ने चाकू की नोक से कहा हैं।
छूने की अदा छोड़ के फर्क हममें कहां हैं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दिल्ली कहे गुंजा बेटी ढूंढे है मुझमें क्या।
शामिल भी हो सकती थी तू बुर्के के बिना।।
दिल्ली कहे गुंजा बेटी ढूंढे है मुझमें क्या।
शामिल भी हो सकती थी तू बुर्के के बिना।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पर्व है लोकतन्त्र का ज़िम्मेदारी के साथ मनाना।
अधिकार है और कर्तव्य भी वोट देने जरूर जाना।।
पर्व है लोकतन्त्र का ज़िम्मेदारी के साथ मनाना।
अधिकार है और कर्तव्य भी वोट देने जरूर जाना।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पैन्ट लिए पेट को बेल्ट में समेटे तो पसीना आ जाए।
काश ठंड का मौसम कुछ महीनों और आगे बढ़ जाए।।
पैन्ट लिए पेट को बेल्ट में समेटे तो पसीना आ जाए।
काश ठंड का मौसम कुछ महीनों और आगे बढ़ जाए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दिल्ली को आलसी कहता एक फर्जी पत्रकार ज़ी।
चौथा स्तम्भ बचा रहेगा हो सवालों में सरकार भी।।
दिल्ली को आलसी कहता एक फर्जी पत्रकार ज़ी।
चौथा स्तम्भ बचा रहेगा हो सवालों में सरकार भी।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जूती गांठी, बोली वाणी लिए कठौती में गंगा।
जय सतगुरु रविदास जी, जो करते मन को चंगा।।
जूती गांठी, बोली वाणी लिए कठौती में गंगा।
जय सतगुरु रविदास जी, जो करते मन को चंगा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
फ़िल्मो की एक छाप से ही मुद्दा मारता है ज़ोर।
बाज़ार में बरेली का इतिहास भूल झुमके का है शोर।।
फ़िल्मो की एक छाप से ही मुद्दा मारता है ज़ोर।
बाज़ार में बरेली का इतिहास भूल झुमके का है शोर।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
6फरवरी की घटना घुसपैठ के दिन हो गए पूरे चार।
गार्गीकॉलेज में कौन घुसे जब JNU महीने से अनजान।।
6फरवरी की घटना घुसपैठ के दिन हो गए पूरे चार।
गार्गीकॉलेज में कौन घुसे जब JNU महीने से अनजान।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पहचाने आवाम को कपड़ो से है फ़िरकापरस्त नेता।
हारे चुनाव तो कहें खीझ में कि ये मुफ़्त है देता।।
पहचाने आवाम को कपड़ो से है फ़िरकापरस्त नेता।
हारे चुनाव तो कहें खीझ में कि ये मुफ़्त है देता।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मोहलत तो मिल गई है दो-चार दिन ज़रूर।
अश्क़ों की कतारों में ना ग़ुम होना ऐ हज़ूर।।
मोहलत तो मिल गई है दो-चार दिन ज़रूर।
अश्क़ों की कतारों में ना ग़ुम होना ऐ हज़ूर।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दिल की ख़ता, उर्दू की ज़बा में आजमाने दो।
माशूक़ को मेरे, अब ग़ालिबन शान पाने दो।।
दिल की ख़ता, उर्दू की ज़बा में आजमाने दो।
माशूक़ को मेरे, अब ग़ालिबन शान पाने दो।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
खामियाज़ा है अगर मंहगा सिलेंडर, हार जाने का।
बेफ़िक्र अब मगर हैं हम, ना डर है जान जाने का।।
खामियाज़ा है अगर मंहगा सिलेंडर, हार जाने का।
बेफ़िक्र अब मगर हैं हम, ना डर है जान जाने का।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लुत्फ़ उठा रहा हूँ कि मौसम कुछ बेईमान सा है।
कम होती सर्दी में हवाओं का असर जाम सा है।।
लुत्फ़ उठा रहा हूँ कि मौसम कुछ बेईमान सा है।
कम होती सर्दी में हवाओं का असर जाम सा है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सीधी धूप,ताज़ी हवा, बारिशी इंद्रधनुष देखने का नसीब।
मैंने लिया ऎसा ही एक छोटा सा घर खरीद।।
सीधी धूप,ताज़ी हवा, बारिशी इंद्रधनुष देखने का नसीब।
मैंने लिया ऎसा ही एक छोटा सा घर खरीद।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिकल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सुना है एक दीवार खड़ी है ग़रीबो के घर के सामने।ग़ैरों के लिए भूल गए अपने ऐसे है इश्क के मामले।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कन्यादान जो शब्द चला इस शब्द में गहरा राज़।
कन्या को जो वस्तु समझे ये था उसका ही आगाज़।।
कन्यादान जो शब्द चला इस शब्द में गहरा राज़।
कन्या को जो वस्तु समझे ये था उसका ही आगाज़।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बेटी की दो बाली बेची, करीबियों से लिया कर्ज़ा।
घर बनाना भी आंसा नही, बहे ख़ून जैसा ख़र्चा।।
बेटी की दो बाली बेची, करीबियों से लिया कर्ज़ा।
घर बनाना भी आंसा नही, बहे ख़ून जैसा ख़र्चा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
तक्षशिला सी जामिया घटना को यूं जोड़ दिया।
कोस रहा ख़ुद को मैं क्यूं मैंने पढ़ना छोड़ दिया।।
तक्षशिला सी जामिया घटना को यूं जोड़ दिया।
कोस रहा ख़ुद को मैं क्यूं मैंने पढ़ना छोड़ दिया।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
माहवारी शारीरिक क्रिया है, ना कुछ उससे ज़्यादा।
औरत का मासिक शोषण करते, धर्म के ढोंगी बाबा।।
माहवारी शारीरिक क्रिया है, ना कुछ उससे ज़्यादा।
औरत का मासिक शोषण करते, धर्म के ढोंगी बाबा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
स्वयंशाह किस क़दर आवाम की ख़याली देखता होगा।
बोले, कोई मरने आ रहा है तो जिंदा कैसे होगा।।
स्वयंशाह किस क़दर आवाम की ख़याली देखता होगा।
बोले, कोई मरने आ रहा है तो जिंदा कैसे होगा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ठरकते ठाकुर और पठान नें क्या ठंड में ठाना हैं।
ठगेंगे और कहेंगे ठसक के साथ अंगूठा उठाना हैं।।
ठरकते ठाकुर और पठान नें क्या ठंड में ठाना हैं।
ठगेंगे और कहेंगे ठसक के साथ अंगूठा उठाना हैं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वो मास्टर है मास्टरी के कायदे- फ़ायदे जाने।
फसे मुश्किल में तो बात दूसरों पर डालना जाने।।
वो मास्टर है मास्टरी के कायदे- फ़ायदे जाने।
फसे मुश्किल में तो बात दूसरों पर डालना जाने।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
श्रृंगार कर वो मंदिर आर्य देव ट्रंप का खोलता है।
याद आया जब अपने को आर्य पुत्र बोलता है।।
श्रृंगार कर वो मंदिर आर्य देव ट्रंप का खोलता है।
याद आया जब अपने को आर्य पुत्र बोलता है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ज़बरदस्ती, काबिलियत का लोहा मनवा रखा है।
जैसा चाहता है वो, हूबहू फ़ोटो खिंचवा रखा है।।
ज़बरदस्ती, काबिलियत का लोहा मनवा रखा है।
जैसा चाहता है वो, हूबहू फ़ोटो खिंचवा रखा है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गांधी के चरखे ने गोड़से की पिस्तौल से कहा।
हिंसा, खून, आतंक, हत्या ग़र हल हैं तो अंत है कहां।।
गांधी के चरखे ने गोड़से की पिस्तौल से कहा।
हिंसा, खून, आतंक, हत्या ग़र हल हैं तो अंत है कहां।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गृहमंत्री,मुख्यमंत्री व्यक्त करें दिल्ली पर राय।
यार,बिस्किट के साथ लाना कड़क ग्रीन चाय।।
गृहमंत्री,मुख्यमंत्री व्यक्त करें दिल्ली पर राय।
यार,बिस्किट के साथ लाना कड़क ग्रीन चाय।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जो कुछ हो गया वो हो गया, कहता सलाहकार।
तनख्वाह जो मिली थी आपको, वो हो गई बेकार।।
जो कुछ हो गया वो हो गया, कहता सलाहकार।
तनख्वाह जो मिली थी आपको, वो हो गई बेकार।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत तर्जुमा करती है अपने ही क़ायदे से।
मरे हिन्दू या मुस्लिम रहती है हमेशा फायदे से।।
हुक़ूमत तर्जुमा करती है अपने ही क़ायदे से।
मरे हिन्दू या मुस्लिम रहती है हमेशा फायदे से।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
साजिश में जो बात निकल कर है सामने आ रही।
साजिश वहीं है हुक़ूमत जिसको साजिशन छिपा रही।।
साजिश में जो बात निकल कर है सामने आ रही।
साजिश वहीं है हुक़ूमत जिसको साजिशन छिपा रही।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जबसे ये आर्थिक बहिष्कार का चिर शब्द सुना है।
लगता है सिरफिरों ने मुल्क के शोषण को चुना है।।
जबसे ये आर्थिक बहिष्कार का चिर शब्द सुना है।
लगता है सिरफिरों ने मुल्क के शोषण को चुना है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हिमाक़त ख़बरनवीस कि, मुँह खुदसे अगर खोले।
हुक़ूमत लिख के देती हैं, कहे इस लिहाज़ से बोले।।
हिमाक़त ख़बरनवीस कि, मुँह खुदसे अगर खोले।
हुक़ूमत लिख के देती हैं, कहे इस लिहाज़ से बोले।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बिधान ख़ुद का बना झंडाबरदार बन गए।
ब्रांडिग को ख़ुद से लपेटे चौकीदार बन गए।।
बिधान ख़ुद का बना झंडाबरदार बन गए।
ब्रांडिग को ख़ुद से लपेटे चौकीदार बन गए।।
कल शाम नुक्क्ड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अभी तक लड़ रहे थे पत्थरो से मजहबों में हम।
कोरोना साथ वो हाय लाया फिर लड़ने एक हो गए हम।।
अभी तक लड़ रहे थे पत्थरो से मजहबों में हम।
कोरोना साथ वो हाय लाया फिर लड़ने एक हो गए हम।।
कल शाम नुक्क्ड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अभी तक लड़ रहे थे पत्थरो से मजहबों में हम।
कोरोना साथ वो हाय लाया फिर लड़ने एक हो गए हम।।
अभी तक लड़ रहे थे पत्थरो से मजहबों में हम।
कोरोना साथ वो हाय लाया फिर लड़ने एक हो गए हम।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शृंखला में एक और बैंक सड़क की ख़ाक छानेगा।
पर अर्थ की अव्यवस्था को वो ट्रिलियन में मानेगा।।
शृंखला में एक और बैंक सड़क की ख़ाक छानेगा।
पर अर्थ की अव्यवस्था को वो ट्रिलियन में मानेगा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते बोल नारी का करते भोग।
नारी की जीते जी होली जला जश्न मनाते लोग।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते बोल नारी का करते भोग।
नारी की जीते जी होली जला जश्न मनाते लोग।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
स्टेटबैंक ने यस कहा तो पैसा सोचो किसका डालेगा।
ईमानदारी का बचाया पैसा भी डूबता बैंक मारेगा।।
स्टेटबैंक ने यस कहा तो पैसा सोचो किसका डालेगा।
ईमानदारी का बचाया पैसा भी डूबता बैंक मारेगा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नाकामी छिपाने का फक़त एक ही सहारा है।
जब हार्डवर्क असर दिखाए तो गांधी बहाना है।
नाकामी छिपाने का फक़त एक ही सहारा है।
जब हार्डवर्क असर दिखाए तो गांधी बहाना है।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रजवाड़े हैं कहीं तो टीस गहरी भी दबी होंगी।
लोकतंत्र में राजशाही की नसे भी खौलती होंगी।।
रजवाड़े हैं कहीं तो टीस गहरी भी दबी होंगी।
लोकतंत्र में राजशाही की नसे भी खौलती होंगी।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बुतों का भी हश्र ख़ुद बनाया है।
श्रृंगार कर कहा अब ख़ुदाया हैं।
बुतों का भी हश्र ख़ुद बनाया है।
श्रृंगार कर कहा अब ख़ुदाया हैं।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
विभीषण है अगर वो पात्र जो लंका जलाएगा।
तो नायक रामलीला का भी लंका से ही आएगा।।
विभीषण है अगर वो पात्र जो लंका जलाएगा।
तो नायक रामलीला का भी लंका से ही आएगा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कोविड19 के डर का है लगे मुझे शायराना व्यक्त।
हथियार छूने का जैविक विदेशी पैदा ही हुआ वयस्क।।
कोविड19 के डर का है लगे मुझे शायराना व्यक्त।
हथियार छूने का जैविक विदेशी पैदा ही हुआ वयस्क।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कोई गो कोरोना कहता, कोई मूत पिए चौपाए का।
मूर्ख बनाते नेता-धर्मगुरु, कुछ हो अस्पताल जाने का।।
कोई गो कोरोना कहता, कोई मूत पिए चौपाए का।
मूर्ख बनाते नेता-धर्मगुरु, कुछ हो अस्पताल जाने का।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रिवायत अब रही बाक़ी ना गिनना अब बहानों को।
ख़िलाफत है अगर समझो बदल दो रहनुमाओं को।।
रिवायत अब रही बाक़ी ना गिनना अब बहानों को।
ख़िलाफत है अगर समझो बदल दो रहनुमाओं को।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मुसीबत है वो पर उसे कोई आड़े हाथ लेता है।
रुपए का दस है मास्क पर उसे वो सौ में देता है।
मुसीबत है वो पर उसे कोई आड़े हाथ लेता है।
रुपए का दस है मास्क पर उसे वो सौ में देता है।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
प्याज़ भी शरमाई है परतों के तकाज़े में।
मुंसिफ ही शामिल है अाईन के ज़नाजे में।।
प्याज़ भी शरमाई है परतों के तकाज़े में।
मुंसिफ ही शामिल है अाईन के ज़नाजे में।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
महसूल अब लगाएगी हुक़ूमत वायरस के नाम पे।
लाचार कहेंगे, बेच स्टेचू इस्पाती और काट ले।।
महसूल अब लगाएगी हुक़ूमत वायरस के नाम पे।
लाचार कहेंगे, बेच स्टेचू इस्पाती और काट ले।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मौत तो आ ही जाती, फांसी भी आख़िरी सज़ा हैं।
पितृसत्तात्मक किला ढहे हर निर्भया की रज़ा हैं।।
मौत तो आ ही जाती, फांसी भी आख़िरी सज़ा हैं।
पितृसत्तात्मक किला ढहे हर निर्भया की रज़ा हैं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
फ़िक्र मुझको है कितनी इस बात से जाना जाए।
मेरी हर पोस्ट को राष्ट्र के नाम सन्देश माना जाए।।
फ़िक्र मुझको है कितनी इस बात से जाना जाए।
मेरी हर पोस्ट को राष्ट्र के नाम सन्देश माना जाए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बाईस को घर पर ही रहना साथ बच्चे, माँ, बीवी होगी।
कोरोना को हराना है एक शुरुआत घर से भी होगी।।
बाईस को घर पर ही रहना साथ बच्चे, माँ, बीवी होगी।
कोरोना को हराना है एक शुरुआत घर से भी होगी।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत तंज कसती है कहे नासमझ आवाम मेरी है।
डर था कोरोना का नही बताती क्या तैयारी मेरी है।।
हुक़ूमत तंज कसती है कहे नासमझ आवाम मेरी है।
डर था कोरोना का नही बताती क्या तैयारी मेरी है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लापरवाही ना करना लेले अब सबसे तू एकांत।
वरना तू क्या कर लेगा जब हो तेरा ही देहांत।।
लापरवाही ना करना लेले अब सबसे तू एकांत।
वरना तू क्या कर लेगा जब हो तेरा ही देहांत।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
भीड़ बने बिन सोचे समझे किया पांच बजे हुड़दंग।
जमघट लगाए लोग इकट्ठे और आपातकर्मी दंग।।
भीड़ बने बिन सोचे समझे किया पांच बजे हुड़दंग।
जमघट लगाए लोग इकट्ठे और आपातकर्मी दंग।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बेरोज़गारी, महंगाई, भूख गरीब की खाल खिचवाएंगी।
हुक़ूमत इस बीमारी में फिर उनसे थाली पिटवाएगी।।
बेरोज़गारी, महंगाई, भूख गरीब की खाल खिचवाएंगी।
हुक़ूमत इस बीमारी में फिर उनसे थाली पिटवाएगी।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पप्पू मेरे अख़बार वाले इसे तुम बेमतलब मत लेना।
पैसा दूंगा पूरा पर कल से अख़बार मुझे मत देना।।
पप्पू मेरे अख़बार वाले इसे तुम बेमतलब मत लेना।
पैसा दूंगा पूरा पर कल से अख़बार मुझे मत देना।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धन्नासेठ पकड़े घंटा छत पर कहता सब ठहरो सब्र करो।
अब के बरस एक बिज़नेस प्लान होगा जियो या मरो।।
धन्नासेठ पकड़े घंटा छत पर कहता सब ठहरो सब्र करो।
अब के बरस एक बिज़नेस प्लान होगा जियो या मरो।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अलाना कहे फलाने से वो बोलेगा फिर ज़माने से।
युद्ध है संसाधन का ना जीतेंगे मुंह के चलाने से।
अलाना कहे फलाने से वो बोलेगा फिर ज़माने से।
युद्ध है संसाधन का ना जीतेंगे मुंह के चलाने से।
कल शाम नुक्कड पर बुद्ध मिले कहते थे,
ठीकरा आड़ में फोड़ने की तैयारी पूरी करवाएगी।
हुक़ूमत कोराेना को डूबे वित्त का कफन बनाएगी।।
ठीकरा आड़ में फोड़ने की तैयारी पूरी करवाएगी।
हुक़ूमत कोराेना को डूबे वित्त का कफन बनाएगी।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दो मंत्री दोनों वायरस से लड़ने के तरीके सुझाए।
एक डराए, दूजा खोजे एहतियाती जीने के उपाय।।
दो मंत्री दोनों वायरस से लड़ने के तरीके सुझाए।
एक डराए, दूजा खोजे एहतियाती जीने के उपाय।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सोशल डिस्टेंसिंग शब्द गलत है भेदभाव का भाव।
फिजिकल डिस्टेंसिंग शब्द सही है लोकतंत्र का चाव।।
सोशल डिस्टेंसिंग शब्द गलत है भेदभाव का भाव।
फिजिकल डिस्टेंसिंग शब्द सही है लोकतंत्र का चाव।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
प्लेन से लाए कोरोना जनवरी महीने से लगातार।
मज़दूर को शहर छोड़ने के लिए दिए पैदल घंटे चार।।
प्लेन से लाए कोरोना जनवरी महीने से लगातार।
मज़दूर को शहर छोड़ने के लिए दिए पैदल घंटे चार।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
तुगलकी फरमान भी 14वीं सदी के बाद टूटेगा।
अब जब बजेंगे शाम 8 तो इतिहास हमसे पूछेगा।।
तुगलकी फरमान भी 14वीं सदी के बाद टूटेगा।
अब जब बजेंगे शाम 8 तो इतिहास हमसे पूछेगा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कारवां गुज़र रहा है पेट खाली गुम जहां।
रोज़गार छिन गया है छाले पैर में यहां।।
कारवां गुज़र रहा है पेट खाली गुम जहां।
रोज़गार छिन गया है छाले पैर में यहां।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
डिप्रेशन अब नहीं जीने को नया आयाम देता हूं।
घर में झाड़ू लगाकर झूठे बर्तन मांझ लेता हूं।।
डिप्रेशन अब नहीं जीने को नया आयाम देता हूं।
घर में झाड़ू लगाकर झूठे बर्तन मांझ लेता हूं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
योजना तो ख़त्म की पर नीति तो बतानी थी।
बोलने से पहले ख़ुद क्रोनोलॉजी तो बनानी थी।।
योजना तो ख़त्म की पर नीति तो बतानी थी।
बोलने से पहले ख़ुद क्रोनोलॉजी तो बनानी थी।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कोरोेना के खिलाफ़ हुए तीन अपने पेशेवर कर्मी।
जय पुलिसकर्मी,जय सफाईकर्मी,जय स्वास्थ्यकर्मी।।
कोरोेना के खिलाफ़ हुए तीन अपने पेशेवर कर्मी।
जय पुलिसकर्मी,जय सफाईकर्मी,जय स्वास्थ्यकर्मी।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
असर इस बात का मैं देखता हूं अब ज़माने में।
मुस्लिम कंधा दे रहा है हिन्दू भाई के जनाजे में।।
असर इस बात का मैं देखता हूं अब ज़माने में।
मुस्लिम कंधा दे रहा है हिन्दू भाई के जनाजे में।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अतिसक्रियता बरेली के बाबुओं की क्या हमे देगी।
पैदल गरीबी कम चली जो सड़क पर दर्द धो लेगी।।
अतिसक्रियता बरेली के बाबुओं की क्या हमे देगी।
पैदल गरीबी कम चली जो सड़क पर दर्द धो लेगी।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
'छुपे हुए' और 'फंसे हुए' का खेल खिलाता जाए।
मीडिया मेरे देश का सांप्रदायिक मेल दिखाता जाए।।
'छुपे हुए' और 'फंसे हुए' का खेल खिलाता जाए।
मीडिया मेरे देश का सांप्रदायिक मेल दिखाता जाए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कुत्तों ने बोटी सूंघ ली अब नोचने दो मौज से।
मीडिया मुल्क की गुलज़ार है मूर्खो की फ़ौज से।।
कुत्तों ने बोटी सूंघ ली अब नोचने दो मौज से।
मीडिया मुल्क की गुलज़ार है मूर्खो की फ़ौज से।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मरकज़ ना बने इस वक्त ना इकट्ठा हो मज़हबों की ज़मात।
सभी धर्मो को भी पालन करनी है क़ानून की समात।।
मरकज़ ना बने इस वक्त ना इकट्ठा हो मज़हबों की ज़मात।
सभी धर्मो को भी पालन करनी है क़ानून की समात।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सवाल बुनियादी कोरोना फैलाने का करे संत्री।
बताओ कौन है मुल्क का नागरिक उ्डयन मंत्री।।
बताओ कौन है मुल्क का नागरिक उ्डयन मंत्री।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पद की मर्यादा और प्रतिष्ठा टोटकों में तोलता है।
प्रजा को कभी बजाने कभी जलाने को बोलता है।।
पद की मर्यादा और प्रतिष्ठा टोटकों में तोलता है।
प्रजा को कभी बजाने कभी जलाने को बोलता है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
राहत भी परेशान है इंदौर के हालात देखकर।
ख़ुदा हैरान इंसानी फरिश्तों को इंदौर भेजकर।।
राहत भी परेशान है इंदौर के हालात देखकर।
ख़ुदा हैरान इंसानी फरिश्तों को इंदौर भेजकर।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सिर अपना छुपा लेता है रेत में वो मुसीबत को देखकर।
सोचता है कि लौट गई मुसीबत बिन मुझको देखकर।।
सिर अपना छुपा लेता है रेत में वो मुसीबत को देखकर।
सोचता है कि लौट गई मुसीबत बिन मुझको देखकर।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बशर्ते किसी भी चुनौती को मिलकर हम तोड़ देंगे।
गर धर्म और जात के मिथक आपस का हम छोड़ देंगे।।
बशर्ते किसी भी चुनौती को मिलकर हम तोड़ देंगे।
गर धर्म और जात के मिथक आपस का हम छोड़ देंगे।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रौशनी में दियों की शायद ये हुक़ूमती घात दिख जाए।
क़वायद में उम्र ना गैरआईन रिवाज़ों को मिल पाए।।
रौशनी में दियों की शायद ये हुक़ूमती घात दिख जाए।
क़वायद में उम्र ना गैरआईन रिवाज़ों को मिल पाए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रिवाज़ के टोटकों से मुश्किलों का आंसा होना।
शिक्षा छोड़ वापस अन्धविश्वास में जाना होगा।।
रिवाज़ के टोटकों से मुश्किलों का आंसा होना।
शिक्षा छोड़ वापस अन्धविश्वास में जाना होगा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
झूठी तसल्ली का तमाशा करना।
बुझा के रौशनी, रौशनी करना।।
झूठी तसल्ली का तमाशा करना।
बुझा के रौशनी, रौशनी करना।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
उस्ताद कहे जमूरे से ड्रामे में बस इतना ही करना।
ध्यान खींचना लोगों का बस पढे लिखों से बचना।।
उस्ताद कहे जमूरे से ड्रामे में बस इतना ही करना।
ध्यान खींचना लोगों का बस पढे लिखों से बचना।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मुख़ातिब पहले मुल्क से फिर बोले ख़ुदकी लीग से।
सियासत का निशा जिस्म पे भेड़ सुनते ठीक से।।
मुख़ातिब पहले मुल्क से फिर बोले ख़ुदकी लीग से।
सियासत का निशा जिस्म पे भेड़ सुनते ठीक से।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कारगुजारियां आज मेरी मुझे सरेआम सताएंगी।
सच को सीधा कहने की आदत रुसवा कराएंगी।।
कारगुजारियां आज मेरी मुझे सरेआम सताएंगी।
सच को सीधा कहने की आदत रुसवा कराएंगी।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लोग हक़ जता के एहसान सा सम्मान करते हैं।
शुक्रिया दे सेवाकर्मियों का फ़ोटो फ़ेसबुक पर डाल देते हैं।
लोग हक़ जता के एहसान सा सम्मान करते हैं।
शुक्रिया दे सेवाकर्मियों का फ़ोटो फ़ेसबुक पर डाल देते हैं।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अहसान करने के अन्दाज़ से मांगी है दवा की मदद।
एक हाथ से पसीना पूछू, संभालू दूसरे से गिनती की रसद।।
अहसान करने के अन्दाज़ से मांगी है दवा की मदद।
एक हाथ से पसीना पूछू, संभालू दूसरे से गिनती की रसद।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ये धर्म के अंधे बस ये मन में एक फितूर पाले हैं।
मरने पर हुरों कि मौज और सोमरस के प्याले हैं।।
ये धर्म के अंधे बस ये मन में एक फितूर पाले हैं।
मरने पर हुरों कि मौज और सोमरस के प्याले हैं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सच बोलने के क़ाबिल हूं या नहीं हूं मैं।
साबित मैं ये करूंगा हूं या नहीं हूं मैं।।
सच बोलने के क़ाबिल हूं या नहीं हूं मैं।
साबित मैं ये करूंगा हूं या नहीं हूं मैं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
उर्दू ज़बा में मैंने जो शिक़ायत दर्ज़ की।
सिफ़ारिशें कर रहे हैं बस मेरे अर्ज़ की।।
उर्दू ज़बा में मैंने जो शिक़ायत दर्ज़ की।
सिफ़ारिशें कर रहे हैं बस मेरे अर्ज़ की।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इश्क़ में ज़रूरी नहीं कि इज़हार भी होगा।
वो मेरी हैं मैं उनका ये जता के क्या होगा।।
इश्क़ में ज़रूरी नहीं कि इज़हार भी होगा।
वो मेरी हैं मैं उनका ये जता के क्या होगा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नमस्ते ट्रंप करता था जो ना था वक़्त सिंपल सा।
खामियाज़ा ख़ता का उठाता अब मुल्क़ लिंकन का।।
नमस्ते ट्रंप करता था जो ना था वक़्त सिंपल सा।
खामियाज़ा ख़ता का उठाता अब मुल्क़ लिंकन का।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जोतिबा माने झूठ और पाखंड, ग्रंथो का झंडा है।
धर्म नहीं है धंधा है, इंसानी भेदभाव का फंदा है।।
जोतिबा माने झूठ और पाखंड, ग्रंथो का झंडा है।
धर्म नहीं है धंधा है, इंसानी भेदभाव का फंदा है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मुफ़लिसी शर्मिंदगी में गर तब्दील हो जाए।
वज़ूद बनाए रखिए ना शख्सियत खो पाए।।
मुफ़लिसी शर्मिंदगी में गर तब्दील हो जाए।
वज़ूद बनाए रखिए ना शख्सियत खो पाए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मुख़्तसर सी ख़बरनवीसी का अख़बार है।
हुक़ूमत से जो सवालात करे वो ग़द्दार है।।
मुख़्तसर सी ख़बरनवीसी का अख़बार है।
हुक़ूमत से जो सवालात करे वो ग़द्दार है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लक्षमण एक पात्र है केवल रेखा एक आदेश।
नियंत्रित पुरुष करे कि स्त्री में कैसा हो आवेश।।
लक्षमण एक पात्र है केवल रेखा एक आदेश।
नियंत्रित पुरुष करे कि स्त्री में कैसा हो आवेश।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अम्बेडकर ने घाव सहते दिया ग़रीबो को न्याय पक्का।
सोच मैंने इस घाव को अपनी यादों में हरा रक्खा।।
अम्बेडकर ने घाव सहते दिया ग़रीबो को न्याय पक्का।
सोच मैंने इस घाव को अपनी यादों में हरा रक्खा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
झूठों की आजमाईश हो तो याद यही एक रखना।
खबरें जी भर देखिएगा और गोदी बोदी जपना।।
झूठों की आजमाईश हो तो याद यही एक रखना।
खबरें जी भर देखिएगा और गोदी बोदी जपना।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मुहब्बत और इश्क़ में फ़र्क है।
एक चाहत एक अलग जुनून है।।
मुहब्बत और इश्क़ में फ़र्क है।
एक चाहत एक अलग जुनून है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बे अस्ल गढ़ लेते हैं जो सदियों से किया करते थे।
दलाल हैं जो बुतो को सजा के लगाया करते थे।।
बे अस्ल गढ़ लेते हैं जो सदियों से किया करते थे।
दलाल हैं जो बुतो को सजा के लगाया करते थे।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जो इनकार में इक़रार ना ढूंढ सके वो आशिक़ क्या।
जिसमें फासले और इज़्तिराब ना हों वो इश्क़ कैसा।।
जो इनकार में इक़रार ना ढूंढ सके वो आशिक़ क्या।
जिसमें फासले और इज़्तिराब ना हों वो इश्क़ कैसा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बच्चे कर रहें हुक्म देख तामील।
एकलव्य बने पूरी करें तालीम।।
बच्चे कर रहें हुक्म देख तामील।
एकलव्य बने पूरी करें तालीम।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रक़ीब अव्वल ही रहता है मैं चाहूं जो जतन कर लूं।
उम्मीद अब हुस्न से ही है वो कुछ नीचे ज़रा आए।।
रक़ीब अव्वल ही रहता है मैं चाहूं जो जतन कर लूं।
उम्मीद अब हुस्न से ही है वो कुछ नीचे ज़रा आए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दिल्ली जो कब्र -ए- शहर है कभी बेवा रही नहीं।
आब-ए-तल्ख़ है जैसे ख़त्म होती कभी नहीं।।
दिल्ली जो कब्र -ए- शहर है कभी बेवा रही नहीं।
आब-ए-तल्ख़ है जैसे ख़त्म होती कभी नहीं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अफ़वाहों ने पंख खोए थे फिर अक्ल खा गए।
अहमक़ो के खाली दिमाक़ भी रोज़गार पा गए।।
अफ़वाहों ने पंख खोए थे फिर अक्ल खा गए।
अहमक़ो के खाली दिमाक़ भी रोज़गार पा गए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बीमारियां भी जाति धर्म भाषा देख नहीं फैलती ।
बस इंसानी कौम ही इन्हें धंधा बना कर बेचती।।
बीमारियां भी जाति धर्म भाषा देख नहीं फैलती ।
बस इंसानी कौम ही इन्हें धंधा बना कर बेचती।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वो भीड़ जो हत्या करने को है आमादा।
जानती कुछ नहीं और मानती है ज़्यादा।।
वो भीड़ जो हत्या करने को है आमादा।
जानती कुछ नहीं और मानती है ज़्यादा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शिद्दत से कर रहा हूं इंतज़ाम मैं।
मुद्दत हो गई है इस इंतज़ार में।।
शिद्दत से कर रहा हूं इंतज़ाम मैं।
मुद्दत हो गई है इस इंतज़ार में।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जन्नत नसीब होगी क्या जन्नत का मज़ा है।
बेकार के ख़यालों में उलझा ये सारा जहां है।।
जन्नत नसीब होगी क्या जन्नत का मज़ा है।
बेकार के ख़यालों में उलझा ये सारा जहां है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कभी चीन कभी जमाती कभी प्रतिरक्षा प्रणाली तुम्हारी।
हुक़ूमत ये माने कोई कमी नही हमारी।।
कभी चीन कभी जमाती कभी प्रतिरक्षा प्रणाली तुम्हारी।
हुक़ूमत ये माने कोई कमी नही हमारी।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अर्थिया ज़नाजो से क्या फर्क रहीं हैं।
ये भीड़ है इसका कोई धर्म नहीं है।।
अर्थिया ज़नाजो से क्या फर्क रहीं हैं।
ये भीड़ है इसका कोई धर्म नहीं है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
तरन्नुम में एक साथ कौमी तराने गाने का वक्त है।
मिटा कर धर्म ज़ात का फर्क सभी में एक रक्त है।।
तरन्नुम में एक साथ कौमी तराने गाने का वक्त है।
मिटा कर धर्म ज़ात का फर्क सभी में एक रक्त है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
खबरों के संवाद में गैंग बोलने की नई रीत चली है।
कवायद किसी को खुश करने की भाषा पर मली है।।
खबरों के संवाद में गैंग बोलने की नई रीत चली है।
कवायद किसी को खुश करने की भाषा पर मली है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चैक किट करें या कोरोना।
अब डीए भी कट गया ना।।
चैक किट करें या कोरोना।
अब डीए भी कट गया ना।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
संवाद हम बनाए गर मशवरे की तर्ज़ पर।
हुक़ूमत मुंह फुला ले इस नाचीज़ अर्ज़ पर।।
संवाद हम बनाए गर मशवरे की तर्ज़ पर।
हुक़ूमत मुंह फुला ले इस नाचीज़ अर्ज़ पर।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दिगर बात है मुफ़लिसी, रोज़गार की सोहबत मांगे।
किराएदार, मकां मालिक से कुछ और मौहलत मांगे।।
दिगर बात है मुफ़लिसी, रोज़गार की सोहबत मांगे।
किराएदार, मकां मालिक से कुछ और मौहलत मांगे।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
तिश्नगी पाने की जन्नत कभी ना दिल में मै पालूं।
नर्क भी मिल जाए तो उसे पहली जन्नत कर दूं।।
तिश्नगी पाने की जन्नत कभी ना दिल में मै पालूं।
नर्क भी मिल जाए तो उसे पहली जन्नत कर दूं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चरण पखारे फोटू खींचा कहते हुई पुष्प वर्षा।
जब ये ऐसा काम है तो दलित ही है क्यों कर्ता।।
चरण पखारे फोटू खींचा कहते हुई पुष्प वर्षा।
जब ये ऐसा काम है तो दलित ही है क्यों कर्ता।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शायरी जो उर्दू में है मुहब्बत की ज़बान है।
शिकायत का इज़हार भी मीठी अज़ान है।।
शायरी जो उर्दू में है मुहब्बत की ज़बान है।
शिकायत का इज़हार भी मीठी अज़ान है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
तबीयत पूछने ख़ुद क़ातिल घर मेरे आया ।
बैठते ही पूछा खंजर जिगर कैसे चूक पाया।।
तबीयत पूछने ख़ुद क़ातिल घर मेरे आया ।
बैठते ही पूछा खंजर जिगर कैसे चूक पाया।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मक्ख़नबाज़ है रानी की झुक के बलाए लेता है।
मैडम आप ही की ख़ातिर जन्मा बताए देता है।।
मक्ख़नबाज़ है रानी की झुक के बलाए लेता है।
मैडम आप ही की ख़ातिर जन्मा बताए देता है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
प्रभु ने युद्ध से पहले शिष्य को जो सिखाया था।
साहेब ये क़त्ल मेने नही मुझसे उसने ही कराया था।।
प्रभु ने युद्ध से पहले शिष्य को जो सिखाया था।
साहेब ये क़त्ल मेने नही मुझसे उसने ही कराया था।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लॉकडाउन में घर की पाठशाला में बीवी हमें बताएं।
झाड़ू आगे बढ़ते और पोछा पीछे हटते हुए लगाएं।।
लॉकडाउन में घर की पाठशाला में बीवी हमें बताएं।
झाड़ू आगे बढ़ते और पोछा पीछे हटते हुए लगाएं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ख़ाली हाथ, सूनी आंखे पूछ रहें है पसीना।
मज़दूर भूखे मना रहें है मई का लाल महीना।।
ख़ाली हाथ, सूनी आंखे पूछ रहें है पसीना।
मज़दूर भूखे मना रहें है मई का लाल महीना।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चली गाड़ियां ले श्रमिक अपने अपने ठोर।
हुक़ूमत टूटी कैसे तेरे विश्वास की डोर।।
चली गाड़ियां ले श्रमिक अपने अपने ठोर।
हुक़ूमत टूटी कैसे तेरे विश्वास की डोर।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कंधों से कंधे मिला के काम की आदत है हमें।।
काम कोई भी कैसा भी पूरा करने की आदत है हमें।।
काम कोई भी कैसा भी पूरा करने की आदत है हमें।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कुल्टा,कुलच्छनी,डंकिनी,डायन कह के बुलावें।
मर्ज़ी से वो औरत को देवी के अलावा ऎसे भी पुकारें।।
कुल्टा,कुलच्छनी,डंकिनी,डायन कह के बुलावें।
मर्ज़ी से वो औरत को देवी के अलावा ऎसे भी पुकारें।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पैसा कम है बमुश्किल बच्चे दो वक्त की रोटी देखे।
नशे को हुक़ूमत ने खुलवा दिए हैं शराब के ठेके।।
पैसा कम है बमुश्किल बच्चे दो वक्त की रोटी देखे।
नशे को हुक़ूमत ने खुलवा दिए हैं शराब के ठेके।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
तुज़ुर्बा जिसको कहते हैं फ़क़त क्या बाल पक जाना।
नशेमन है ख़याली कि शहद इंसानी बन जाना।।
तुज़ुर्बा जिसको कहते हैं फ़क़त क्या बाल पक जाना।
नशेमन है ख़याली कि शहद इंसानी बन जाना।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मज़दूरों को जमूरा मानता है।
धंधेबाज है कमाना चाहता है।।
मज़दूरों को जमूरा मानता है।
धंधेबाज है कमाना चाहता है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत शराब की हैसियत से वाकिफ़ है।
इंतिख़ाबात के दौरान से ही उसे ये ज़ाहिर है।।
हुक़ूमत शराब की हैसियत से वाकिफ़ है।
इंतिख़ाबात के दौरान से ही उसे ये ज़ाहिर है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ग़रीब को षडयंत्र से अमीर के पीछे किया जाता है।
अंगूठा काट के दिया नहीं काट के लिया जाता है।।
ग़रीब को षडयंत्र से अमीर के पीछे किया जाता है।
अंगूठा काट के दिया नहीं काट के लिया जाता है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शिद्दत से तेरे इश्क का तलबगार हो गया।
हुक़ूमत से सवाल पूछा तो गद्दार हो गया।।
शिद्दत से तेरे इश्क का तलबगार हो गया।
हुक़ूमत से सवाल पूछा तो गद्दार हो गया।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मैं कहता हूं और तुम मानो ये कैसा है ज्ञान।
तोते ही बन जाओगे गर बात ना जाओ जान।।
मैं कहता हूं और तुम मानो ये कैसा है ज्ञान।
तोते ही बन जाओगे गर बात ना जाओ जान।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत है मुझी से तो मेरा तुम वोट वापस दो।
नहीं तो रास्ते में चल कर मरे वो मज़दूर वापस दो।।
हुक़ूमत है मुझी से तो मेरा तुम वोट वापस दो।
नहीं तो रास्ते में चल कर मरे वो मज़दूर वापस दो।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वापस जाने और लाने की ये कैसी परमिशन।
रेल की पटरियों पर कट गया है वंदे भारत मिशन।।
वापस जाने और लाने की ये कैसी परमिशन।
रेल की पटरियों पर कट गया है वंदे भारत मिशन।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मुद्दों को हल करने में गर पदस्त नहीं बन सकते।
सामाजिक होने के नाते तटस्थ नहीं रह सकते।।
मुद्दों को हल करने में गर पदस्त नहीं बन सकते।
सामाजिक होने के नाते तटस्थ नहीं रह सकते।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत लेट चलती है उसे है मशवरा मेरा।
श्रम संसाधन है जो कहता था नेता तेरा।।
हुक़ूमत लेट चलती है उसे है मशवरा मेरा।
श्रम संसाधन है जो कहता था नेता तेरा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
स्वंयवर कहते हैं जिसे है केवल हाट मंडी का।
मोल कर जो चला जाए बने भगवान मंदिर का।।
स्वंयवर कहते हैं जिसे है केवल हाट मंडी का।
मोल कर जो चला जाए बने भगवान मंदिर का।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ज़ख्म जो दिखेगा उसको ही तू चोट है कहता।
अब दिल तो निकाल के मैं दिखा नही सकता।।
ज़ख्म जो दिखेगा उसको ही तू चोट है कहता।
अब दिल तो निकाल के मैं दिखा नही सकता।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बची जिंदगी और हमें कितना बीच दोनों के सताएगी।
हुक़ूमत कहे अंदर बैठो पेट की भूख बाहर बुलाएगी।।
बची जिंदगी और हमें कितना बीच दोनों के सताएगी।
हुक़ूमत कहे अंदर बैठो पेट की भूख बाहर बुलाएगी।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सरकता विश्वास इतिहास का कैसे हो ऐतेबार।
हवाई किले बांधे यहां खुशामदी पत्रकार।।
सरकता विश्वास इतिहास का कैसे हो ऐतेबार।
हवाई किले बांधे यहां खुशामदी पत्रकार।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कुछ जोड़ी चप्पल देखी वहीं पड़ी खाने को रोटियां।
रेल की पटरियों पर आगे जाकर देखी इंसानी बोटियां।।
कुछ जोड़ी चप्पल देखी वहीं पड़ी खाने को रोटियां।
रेल की पटरियों पर आगे जाकर देखी इंसानी बोटियां।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मज़दूरों की मज़बूरी से वो मज़बूत हुआ है।
बीमारी का भी उपयोग क्या ख़ूब हुआ है।।
मज़दूरों की मज़बूरी से वो मज़बूत हुआ है।
बीमारी का भी उपयोग क्या ख़ूब हुआ है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लोकडाऊन कब खोले मंत्री बैठ ये करते सोच।
काश बंद करने से पहले बैठे होते पत्ते सारे खोल।।
लोकडाऊन कब खोले मंत्री बैठ ये करते सोच।
काश बंद करने से पहले बैठे होते पत्ते सारे खोल।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लाखों करोड़ों रुपयों की जब बात कही जाती हैं।
मुझे पटरियों पर पड़ी वो रोटियां याद आती हैं।।
लाखों करोड़ों रुपयों की जब बात कही जाती हैं।
मुझे पटरियों पर पड़ी वो रोटियां याद आती हैं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
श्रमिक जिसने शहर बसाए गांव में क्या कर लेगा।
वित्तीय वर्ष में सौ दिन देगा गर रोज़गार मनरेगा।।
श्रमिक जिसने शहर बसाए गांव में क्या कर लेगा।
वित्तीय वर्ष में सौ दिन देगा गर रोज़गार मनरेगा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सड़क पर बैल के संग मज़दूर गाड़ी में जुटा था।
कुछ ये भी कह देंगे वो आत्मनिर्भर बना था।।
सड़क पर बैल के संग मज़दूर गाड़ी में जुटा था।
कुछ ये भी कह देंगे वो आत्मनिर्भर बना था।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सियासतदान हैं शर्म उनको छू भी नही सकती।
वोट के अलावा कुछ हैसियत तेरी हो नहीं सकती।।
सियासतदान हैं शर्म उनको छू भी नही सकती।
वोट के अलावा कुछ हैसियत तेरी हो नहीं सकती।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
घड़ियाल तो देखा है पर आंसू नहीं वहां।
हुक़्मरान की आंखो से क्या टपका यहां।।
घड़ियाल तो देखा है पर आंसू नहीं वहां।
हुक़्मरान की आंखो से क्या टपका यहां।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रोज़ शाम को बैठ देखे पैसे कैसे उड़ते जाएं।
हिंदी इंग्लिश में हमें सुनाएं पल्ले ना पड़ पाएं।।
रोज़ शाम को बैठ देखे पैसे कैसे उड़ते जाएं।
हिंदी इंग्लिश में हमें सुनाएं पल्ले ना पड़ पाएं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गनीमत रही बाक़ी वो ड्रामा कर तो लेता है।
तुम नाम भी ना लो वो जाके मिल तो लेता है।।
गनीमत रही बाक़ी वो ड्रामा कर तो लेता है।
तुम नाम भी ना लो वो जाके मिल तो लेता है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ग़रीबी हटाओ का नारा अब बना ग़रीब हटाओ।
मज़दूरों की देख हालात तुम क्या सोचो बताओ।।
ग़रीबी हटाओ का नारा अब बना ग़रीब हटाओ।
मज़दूरों की देख हालात तुम क्या सोचो बताओ।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बांटो रेवड़ियां बन अंधे झौला अपनों का भर दो।
कोई सवाल उठाए तो बस देश को आगे कर दो।।
बांटो रेवड़ियां बन अंधे झौला अपनों का भर दो।
कोई सवाल उठाए तो बस देश को आगे कर दो।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जनता भूखी, धंधे चौपट, मज़दूर खोए अपनी जान।
मीडिया दिखाएं टीवी पर थर थर कांपा पाकिस्तान।।
जनता भूखी, धंधे चौपट, मज़दूर खोए अपनी जान।
मीडिया दिखाएं टीवी पर थर थर कांपा पाकिस्तान।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अमरोहा तू तो शहर अपना तेरा पुल अपना था।
जब मज़दूर डर के कूदे थोड़ा झुक जाना था।।
अमरोहा तू तो शहर अपना तेरा पुल अपना था।
जब मज़दूर डर के कूदे थोड़ा झुक जाना था।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
इस तरह नहीं उस तरह,ये नहीं वो,ऎसा नहीं वैसा।
हुक़ूमत के पास नहीं पलायन पर प्लान बी जैसा।।
इस तरह नहीं उस तरह,ये नहीं वो,ऎसा नहीं वैसा।
हुक़ूमत के पास नहीं पलायन पर प्लान बी जैसा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बस तो है, बस, बस नहीं चलाना बसे चलाने में।
हुक़ूमत पसंद नहीं करती जीत के हार जाने में।।
बस तो है, बस, बस नहीं चलाना बसे चलाने में।
हुक़ूमत पसंद नहीं करती जीत के हार जाने में।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कहानियां बनके वो सड़कों पर बिखर जाते हैं।
देश के ही नागरिक है जो प्रवासी कहे जाते हैं।।
कहानियां बनके वो सड़कों पर बिखर जाते हैं।
देश के ही नागरिक है जो प्रवासी कहे जाते हैं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
खोदोगे जो धरती को तो तुम बस मुझको पाओगे।
मिट्टी में दबे अवशेष देखो ख़ुद को मेरे जानोगे।।
खोदोगे जो धरती को तो तुम बस मुझको पाओगे।
मिट्टी में दबे अवशेष देखो ख़ुद को मेरे जानोगे।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सड़क जो ये अभी शहर से गांव लौटी डरी सी है।
जो इस पर चलने निकले पास वो लाशे पड़ी सी हैं।।
सड़क जो ये अभी शहर से गांव लौटी डरी सी है।
जो इस पर चलने निकले पास वो लाशे पड़ी सी हैं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे
मज़दूर मज़बूरी में मशहूर हो गए।
गांव शहरों से बहुत दूर हो गए।।
मज़दूर मज़बूरी में मशहूर हो गए।
गांव शहरों से बहुत दूर हो गए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नक्शा ही बदल जाएगा सब अच्छे बुरों का।
श्रृंगार तुम हटा लो गर इन अपने बुतों का।।
नक्शा ही बदल जाएगा सब अच्छे बुरों का।
श्रृंगार तुम हटा लो गर इन अपने बुतों का।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
देश की नाड़ी रेल गाड़ी उड़ीसा जाएं मुंबई से चलके।
गोरखपुर चिल्लाए है ये नाम किस ढोंगी ने बदले।।
देश की नाड़ी रेल गाड़ी उड़ीसा जाएं मुंबई से चलके।
गोरखपुर चिल्लाए है ये नाम किस ढोंगी ने बदले।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हिंसा को उस समय की अहिंसा से मय किया।
जिससे भी डरे तुम उन्हें अवतार कह दिया।।
हिंसा को उस समय की अहिंसा से मय किया।
जिससे भी डरे तुम उन्हें अवतार कह दिया।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मज़दूरों की हालत से नहीं कोई बेखबर अबतक।
कुछ अदद प्लेन ही दे दो बसों के स्टार्ट होनेतक।।
मज़दूरों की हालत से नहीं कोई बेखबर अबतक।
कुछ अदद प्लेन ही दे दो बसों के स्टार्ट होनेतक।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बदले हालात में भी उसकी दुआ असर दिखाएगी।
इस ईद में तू ना सही तेरी याद मिलने आएगी।।
बदले हालात में भी उसकी दुआ असर दिखाएगी।
इस ईद में तू ना सही तेरी याद मिलने आएगी।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नौतपा की गर्म सड़क और सूख रहा है गला।
मज़दूर बोले बच्चे से आगे एक हरा पेड़ है लगा।
नौतपा की गर्म सड़क और सूख रहा है गला।
मज़दूर बोले बच्चे से आगे एक हरा पेड़ है लगा।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रंगीनियां नहीं शामिल कि कोरा संसार सारा है।
झूठ की छत्र छायां में सच मुकम्मल सहारा है।।
रंगीनियां नहीं शामिल कि कोरा संसार सारा है।
झूठ की छत्र छायां में सच मुकम्मल सहारा है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पत्ते झड़ गए दरख़्त तन्हाई में गुम सा खड़ा।
सूखे पत्तों का ढेर नीचे बन चुप सा पड़ा।।
पत्ते झड़ गए दरख़्त तन्हाई में गुम सा खड़ा।
सूखे पत्तों का ढेर नीचे बन चुप सा पड़ा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मर्ज़ बढ़ता ही जाएगा ना बरती ख़ुद एहतियात गर।
हुक़ूमत मसरूफ़ बैठी सियासत की बिसात पर।।
मर्ज़ बढ़ता ही जाएगा ना बरती ख़ुद एहतियात गर।
हुक़ूमत मसरूफ़ बैठी सियासत की बिसात पर।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
छोटी भूखी बच्ची खेलती है समझती ही नहीं।
माँ तो माँ होती है लाश हो सकती कभी नहीं।।
छोटी भूखी बच्ची खेलती है समझती ही नहीं।
माँ तो माँ होती है लाश हो सकती कभी नहीं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
याद आए फंदो पे झूलते शहीदों के कारनामें।
माफ़ हो सकते नहीं माफ़ी के पर माफ़ीनामें।।
याद आए फंदो पे झूलते शहीदों के कारनामें।
माफ़ हो सकते नहीं माफ़ी के पर माफ़ीनामें।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
महामहिम और माननीय बैठे सोचे साथ।
हुक़ूमत सोचे नहीं बेबस मज़दूरों की बात।।
महामहिम और माननीय बैठे सोचे साथ।
हुक़ूमत सोचे नहीं बेबस मज़दूरों की बात।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
निज़ात नहीं मिलेगी तुम्हे जकात की तरह।
कोशिश ही ना हो गर इन्क़िलाब की तरह।।
निज़ात नहीं मिलेगी तुम्हे जकात की तरह।
कोशिश ही ना हो गर इन्क़िलाब की तरह।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
किताबें अब रोज़ मुझे परेशां नहीं करती।
एक उम्र लगी असल दुनिया समझने में।।
किताबें अब रोज़ मुझे परेशां नहीं करती।
एक उम्र लगी असल दुनिया समझने में।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कोशिश ही नहीं करता नुक़्सान से गुरेज़ है।
उसे किश्ती के गीला होने से बड़ा परहेज़ है।।
कोशिश ही नहीं करता नुक़्सान से गुरेज़ है।
उसे किश्ती के गीला होने से बड़ा परहेज़ है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
भक्त ने जीभ काट ली दूजे ने सिर दिया चढ़ा।
कोरोना देखेंगे पर इन मूर्खो ने क्या संसार गढ़ा।।
भक्त ने जीभ काट ली दूजे ने सिर दिया चढ़ा।
कोरोना देखेंगे पर इन मूर्खो ने क्या संसार गढ़ा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मज़दूर दिवस अगले में एक झांकी भी हो खास।
पटरी पे रोटी, संदूक पे बच्चा, टॉयलेट में लाश।।
मज़दूर दिवस अगले में एक झांकी भी हो खास।
पटरी पे रोटी, संदूक पे बच्चा, टॉयलेट में लाश।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ईश्वर जैसी कोई चीज़ नहीं ना कोई भगवान।
ख़ुद जानो,समझो और दूर करो अपना अज्ञान।।
ईश्वर जैसी कोई चीज़ नहीं ना कोई भगवान।
ख़ुद जानो,समझो और दूर करो अपना अज्ञान।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
"प्लीज़, आई कान्ट ब्रीद" बोले जार्ज दबे हुए।
नस्लीय भेदभाव से अभी भी लोग हैं भरे हुए।।
"प्लीज़, आई कान्ट ब्रीद" बोले जार्ज दबे हुए।
नस्लीय भेदभाव से अभी भी लोग हैं भरे हुए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मज़दूर जो लौटे दुखी ख़ुद अपने नसीब से।
रास्ते में देखा उन्होंने मौत को बहुत क़रीब से।।
मज़दूर जो लौटे दुखी ख़ुद अपने नसीब से।
रास्ते में देखा उन्होंने मौत को बहुत क़रीब से।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मूर्ति मृत है मुर्दा सी निर्जीव हैं।
कर्म कृत है कर्ता सी सजीव हैं।।
मूर्ति मृत है मुर्दा सी निर्जीव हैं।
कर्म कृत है कर्ता सी सजीव हैं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गोरे काले का भेद नही हर दिल से हमारा नाता है।
जाति भेद को छिपा ये गीत अक्सर गाया जाता है।।
गोरे काले का भेद नही हर दिल से हमारा नाता है।
जाति भेद को छिपा ये गीत अक्सर गाया जाता है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
फ़र्क अब नहीं पड़ता कि अब कब होश आएगा।
और जब होश आयेगा फ़र्क नश्तर चुभाएगा।।
फ़र्क अब नहीं पड़ता कि अब कब होश आएगा।
और जब होश आयेगा फ़र्क नश्तर चुभाएगा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत क्वारन्टीन घर के अलग कमरे में कहती ।
मैं जिस घर में रहता हूँ अक्ल कमरा ही कहती ।।
हुक़ूमत क्वारन्टीन घर के अलग कमरे में कहती ।
मैं जिस घर में रहता हूँ अक्ल कमरा ही कहती ।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
होते जवान सीखा जो काम और हुई मज़बूरी मंद।
पहियों पर घूमे एटलस वो सायकिल हो गई बंद।।
होते जवान सीखा जो काम और हुई मज़बूरी मंद।
पहियों पर घूमे एटलस वो सायकिल हो गई बंद।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धूल में लिपटी बिजली सी गोरों पे गाज़ गिराई थी ।
इतिहास पढ़ोगे ख़ुद तो जानोगे एक झलकारी बाई थी।।
धूल में लिपटी बिजली सी गोरों पे गाज़ गिराई थी ।
इतिहास पढ़ोगे ख़ुद तो जानोगे एक झलकारी बाई थी।।
कल शाम नुक्कड पर बुद्ध मिले कहते थे
गर्भ लिए पानी में खड़ी दिन हो गए पूरे तीन।
मां की इंसानी हत्या पर हर जीवित गमगीन।।
गर्भ लिए पानी में खड़ी दिन हो गए पूरे तीन।
मां की इंसानी हत्या पर हर जीवित गमगीन।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गावों में सालों अलख जगा बच्चों में शिक्षा अाई।
लोकडाऊन की बेरोज़गारी वापस शहरों से ले अाई।।
गावों में सालों अलख जगा बच्चों में शिक्षा अाई।
लोकडाऊन की बेरोज़गारी वापस शहरों से ले अाई।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
एहतियात कोरोना से बचाव हेतु।
जरूर करें प्रयोग आरोग्य सेतु।।
एहतियात कोरोना से बचाव हेतु।
जरूर करें प्रयोग आरोग्य सेतु।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ग़ालिब ने ये ना सोचा तो क्यों नहीं सोचा।
हुक़ूमत चुराए हर्फ़ गर ले दीमाक़ में लोचा।।
ग़ालिब ने ये ना सोचा तो क्यों नहीं सोचा।
हुक़ूमत चुराए हर्फ़ गर ले दीमाक़ में लोचा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ऑक्सफोर्ड ने शोध कर पेश की ये एक गणना।
लोकडाऊन में फेल हुकूमत जारी लोगो का मरना।।
ऑक्सफोर्ड ने शोध कर पेश की ये एक गणना।
लोकडाऊन में फेल हुकूमत जारी लोगो का मरना।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कम्यूनिटी स्प्रेड क्या होता है सुन बच्ची है हैरान।
कोरोना से मर गए उसके पापा पिछली शाम।।
कम्यूनिटी स्प्रेड क्या होता है सुन बच्ची है हैरान।
कोरोना से मर गए उसके पापा पिछली शाम।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जिन्हें जनता ने चुना वो नेता खुदमुख्तार हो गए।
हुक़ूमत सुनती ही नहीं जबसे हम बीमार हो गए।।
जिन्हें जनता ने चुना वो नेता खुदमुख्तार हो गए।
हुक़ूमत सुनती ही नहीं जबसे हम बीमार हो गए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जंगल में बांस के ऊपर ख़ूब टीवी दिए लटकाए।
भाषण का राशन उग रहा एक भक्त हमें समझाए।।
जंगल में बांस के ऊपर ख़ूब टीवी दिए लटकाए।
भाषण का राशन उग रहा एक भक्त हमें समझाए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कूड़े की गाड़ी में गर हुक़ूमत इंसान की लाश डालेगी।
आवाज़ भी ना उठाइए नही तो पुलिस जेल में डालेगी।।
कूड़े की गाड़ी में गर हुक़ूमत इंसान की लाश डालेगी।
आवाज़ भी ना उठाइए नही तो पुलिस जेल में डालेगी।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ढेर हुए या शहीद हुए शब्दो की किताब है।
मौत तो मौत हैं ये बस चयन की बात है।।
ढेर हुए या शहीद हुए शब्दो की किताब है।
मौत तो मौत हैं ये बस चयन की बात है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत बांट रही कोरोना के टेस्ट पर कैसा ज्ञान।
शायद माननीय इस पर भी समय से ले संज्ञान।।
हुक़ूमत बांट रही कोरोना के टेस्ट पर कैसा ज्ञान।
शायद माननीय इस पर भी समय से ले संज्ञान।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
किश्तियां अब समंदर में दूर तक जा नहीं पाती।
डर सिर्फ डूबने का है जो मन को पहले डुबाती ।।
किश्तियां अब समंदर में दूर तक जा नहीं पाती।
डर सिर्फ डूबने का है जो मन को पहले डुबाती ।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
डर को, डर से, डरते हुए भगवान बना दो।
डर में,डर की,डराती हुई सरकार बना दो।।
डर को, डर से, डरते हुए भगवान बना दो।
डर में,डर की,डराती हुई सरकार बना दो।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने नहीं सीखा हुक़ूमत चलती कैसे हैं।
खिचड़ी बीरबल की है देखो गलती कैसे हैं।।
हुक़ूमत ने नहीं सीखा हुक़ूमत चलती कैसे हैं।
खिचड़ी बीरबल की है देखो गलती कैसे हैं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गिनती मौत की रोज़ वो मुझको बताते हैं।
नाकामी को अपनी मेरी गलती बताते हैं।।
गिनती मौत की रोज़ वो मुझको बताते हैं।
नाकामी को अपनी मेरी गलती बताते हैं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वो मोहरा मौत के भी बाद बनेगा देखते रहना।
अहमको ने ठाना स्वार्थ की रोटी सेकते रहना।।
वो मोहरा मौत के भी बाद बनेगा देखते रहना।
अहमको ने ठाना स्वार्थ की रोटी सेकते रहना।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
झूले पर मुफ़्त झूल गया।
दोस्ती जल्दी भूल गया।।
झूले पर मुफ़्त झूल गया।
दोस्ती जल्दी भूल गया।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वस्तुत: जैसा है वैसा कह दिया।
दलाल को ऎसा क्या कह दिया।।
वस्तुत: जैसा है वैसा कह दिया।
दलाल को ऎसा क्या कह दिया।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत की गहरी चालो पर थोड़ा ध्यान तो दीजिए।
तभी कहा था ये गेम है साहेब ख़राब मत कीजिए।।
हुक़ूमत की गहरी चालो पर थोड़ा ध्यान तो दीजिए।
तभी कहा था ये गेम है साहेब ख़राब मत कीजिए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पूछा नहीं तो जानूं कैसे, जाने बिना मानू क्यों।
मेरी ना मजबूरी कोई आंख पर पट्टी बांधू क्यों।।
पूछा नहीं तो जानूं कैसे, जाने बिना मानू क्यों।
मेरी ना मजबूरी कोई आंख पर पट्टी बांधू क्यों।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कर्ज़ भारी या मन भारी देखो कैसी दोहरी बात।
मज़दूर की औकात कहां मीडिया मौत पे करले बात।।
कर्ज़ भारी या मन भारी देखो कैसी दोहरी बात।
मज़दूर की औकात कहां मीडिया मौत पे करले बात।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
व्यवस्था कब बनी कबसे चली अब कौन बदलेगा।
इंसान को इंसान से अलग करती किताबें कौन बदलेगा।।
व्यवस्था कब बनी कबसे चली अब कौन बदलेगा।
इंसान को इंसान से अलग करती किताबें कौन बदलेगा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
आपदा को अवसर हमेशा बनाते वो चले आए।
वजह नहीं कि बात इतनी भी ना समझ आए।।
आपदा को अवसर हमेशा बनाते वो चले आए।
वजह नहीं कि बात इतनी भी ना समझ आए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नफरतें अब बयां करती है उनकी राज़दारी को।
कुछ तो था जो ज़िक्र होते ही पल्ला झाड़ लेते हैं।।
नफरतें अब बयां करती है उनकी राज़दारी को।
कुछ तो था जो ज़िक्र होते ही पल्ला झाड़ लेते हैं।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मंहगाई डायन बोल रही चढ़ नैतन के कंधो पे।
कौन के नाती बचो के अब डीज़ल लग्गो धंधों पे।।
मंहगाई डायन बोल रही चढ़ नैतन के कंधो पे।
कौन के नाती बचो के अब डीज़ल लग्गो धंधों पे।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
गले में गमछा नीले रंग का नीचे मोटर बाईक।
मूछ पे उंगली फेर रहें हैं हवा है सबकी टाईट।।
गले में गमछा नीले रंग का नीचे मोटर बाईक।
मूछ पे उंगली फेर रहें हैं हवा है सबकी टाईट।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
आंकड़े कुछ नहीं बिल्ली के खट्टे अंगूर है मियां।
हमने भी पढ़े लिखों को यूहीं समझदार कह दिया।।
आंकड़े कुछ नहीं बिल्ली के खट्टे अंगूर है मियां।
हमने भी पढ़े लिखों को यूहीं समझदार कह दिया।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दवा रखता है झोले में, दावा ज़बान पर।
आवाज़ को तोले है घंटी और अज़ान पर।।
दवा रखता है झोले में, दावा ज़बान पर।
आवाज़ को तोले है घंटी और अज़ान पर।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुस्न अब इश्क को अब और ना तड़फा पाएगा।
नकाब में आंखो की ज़बा पढ़ने का हुनर ना गर आएगा।।
हुस्न अब इश्क को अब और ना तड़फा पाएगा।
नकाब में आंखो की ज़बा पढ़ने का हुनर ना गर आएगा।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जो चांद पर रखता था ज़मीं उसने खुदकुशी की है।
अंजाम है जिसने हर चीज़ पाने की मयकशी की है।।
जो चांद पर रखता था ज़मीं उसने खुदकुशी की है।
अंजाम है जिसने हर चीज़ पाने की मयकशी की है।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
मंत्रों का यंत्र मोक्ष की आस।
भय में लिखी कोरी बकवास।।
मंत्रों का यंत्र मोक्ष की आस।
भय में लिखी कोरी बकवास।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
बिन हैलमेट बिन मास्क के बैठे फ़ोटो खिंचवाए।
दलील है इसमें लाइट खुली है यूहीं बाईक चलवाए।।
बिन हैलमेट बिन मास्क के बैठे फ़ोटो खिंचवाए।
दलील है इसमें लाइट खुली है यूहीं बाईक चलवाए।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जो हुआ वो जन्मो का फल फिर मोक्ष की झूठी बात।
शोषित करती हर प्यादे को धर्म की सजी बिसात।।
जो हुआ वो जन्मो का फल फिर मोक्ष की झूठी बात।
शोषित करती हर प्यादे को धर्म की सजी बिसात।।
कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शानदार, चीनी एप्स से है मुंह मोड़ने की बात।
खबरदार, जो किसी ने की स्टेचू तोड़ने की बात।।
शानदार, चीनी एप्स से है मुंह मोड़ने की बात।
खबरदार, जो किसी ने की स्टेचू तोड़ने की बात।।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें