1 August to December 2019

 कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,

सितमगर से मुहब्बत का सलीका सीख लिया है।

फिर क्या कहे गर इश्क अब खुद से नही होता।|
23 August 2019

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
क़ातिल का मुंसिफ से जाने कैसा रिश्ता था । 
मरते ही मुंसिफ के क़ातिल लगे रोने।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे, 
बिन कन्धों के पुल से वो जो लाश चली थी। 
पन्ने पलट रही है बैठ संविधान के ।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जादू ना सोच तू सुपुर्दे-ख़ाक में सनम ।
मज़लूम की शायद कोई हाय लग गई ।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वक्त-ए-बेरोज़गारी में हुक़ूमत ने चाल ये चली ।
गुल्लक जो फोड़ दी है चलो मुफ़लिसी टली ।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जुमला था कि घर धन "श्याम" लौट आएगा ।
नही पता था घर से ही धन "श्वेत" निकल जाएगा ।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत आंख भी गर एक नोच लें तो शिक़वा कैसा।
ज़माने को नज़र-ए-एक से देखने का फ़रमान मानेगें ।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चाँद, शाम होते ही तू जो सिर पे चढ़ा आता हैं।
ज़द-ए-हिंदुस्तान में हैं,कदमो तले जल्दी होगा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
वो न्यूटन था कि जिसने गिरने का सूत्र था दिया।
गणित कमज़ोर है पर सोचते की रुपया ऐसे ही गिरा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दफ़्तर में कलम लिए बाबू फाइल पे घिसे।
हक़ मज़लूम और बेबस को मिले ध्यान ये रखे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चिर में चितवन से रगड़ चला था चिन्मयानंदू चाम।
MeToo जब उसका चले, कहे चचेरो की है चाल।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
खुश्क होते हुए मौसम की ये बदनियती ही हैं।
शाम को अब जब निकलता हूँ तू रोज़ मेरे साथ होती है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कैफ़ियत कफिल की क्या करें, सोचते हैं मगर।
सांसे जो देकर पड़ गया मुश्किल में चारागर।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ग़ैरमौजूदगी में मेरी उसने महकमे को बहुत लूटा है।
एक वक़्त लगेगा तामीर-ए-ऐतबार के कायम में ।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अस्मिता यूं कुछ धुली है तेवरो में अब हुक़ूमत की।
साल पिछले जो अंधी हो गई थी लंकेश के पीछे ।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
नासमझ हुक़ूमत ख़ुद दावत-ए-अंजाम देती हैं।
काम किसी का है, किसी को सूरत-ए-अंजाम देती है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चन्द्रयान,इंटरनेट,मेट्रो,राफेल, कानून मज़बूत हैं।
फिर गटर की सफाई में क्यूँ आज तक मज़बूर हैं ।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
निम्बू, मिर्चे, नारियल, बनाया कैसा है मायाजाल ।
जहाज़ बना कर बेचे विदेशी,और हम है खरीदार।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
पतिव्रता ने भूक सही और सही पूरे दिन प्यास।
पुरुषव्रता बन जीवन भर सहती पितृसत्ता और हार।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले, कहते थे,
आवाज़-ए-हक़ में मज़बूर की मजबूरी से मज़बूत हुआ है।
दलाल-ए-वक्त हैं,मज़लूम को खुद किस ने सुना है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चढ़ा मेट्रो में जाने को दफ़्तर, देखा अजब-गजब प्रचार।
एक जलाए लाख दीप,एक घायलों को मुफ़्त उपचार।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
साल जो पिछले एक-एक कर जोड़ा जो धन-में-रस।
हाट में जाकर खूब लुटाया जब ये आया धन-ते-रस।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दीवाली दीवा वाली ।
माँ का आशीर्वाद, ख़ुश होते बच्चे, और घूमे इतरारी घरवाली।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
रोज़ ए दिवाली रिश्वतख़ोरी बाबू रहा बिजी।
सरकारी कुर्सी पर बैठा धन्धा करे निजी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
लाख दीप ईमान जगाते, हुआ दर्ज़ कीर्तिमान।
बुझे दियों से तेल बटोरे एक छोटी सी बे ईमान।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जले पराली पहुँचा धुंआ लो छुट्टी हो गई आज।
दिल्ली को ही दोष दे कैसे जब ख़ुदसे हो आगाज़।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
दौर ख़त्म हुआ जब पढे मैंने मुंज़जिर-ए-अखबार।
अब सुबह होते छप जाए रोज़ का मेनिफेस्टो-ए-सरकार।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
फ़ेसबुक पे जो डीपी मास्क पहने अपने लगाए हैं।
बिन AC चलाए कमरे में बैठने को हमने मनाए हैं।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
माननिय को मान कर मान लिया हर ज्ञान।
फिर इनको क्या आन पड़ी जो देने लगे संज्ञान।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
फीस बढ़ाई तो दिया आक्रोश में मिलकर बवाल काट।
सोचो जब उन्होंने एक्लव्य का अंगूठा लिया था काट।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले, कहते थे,
आओ ज़नाब घूम लें दिल्ली के तहज़ीबी शहर में हम।
यमुना हमे दिखाएगी पल ख़ुशियों के हों या गम।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत-ए-शहर अगर मिल जाए मुझसे आज रस्ते पर।
हाल-ए-मौसम जता के बोल दूंगा क़फ़न के दाम सस्ते कर।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सुनी है जबसे वो अंदर नोट की बात चिप वाली।
छिपा के नोट कपड़ो में मेरे, नज़र रखती है घरवाली।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत जिसको कहते हैं फ़क़त एक ख्याल है उनका।
दबा कर कैसे रखना है महज़ एक हथियार है उनका।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
धर्म किसी में जन्मा हो,कम नहीं इंसान ही होगा।
पढ़ाए बच्चों को उसमें, धर्म नहीं ईमान ही होगा।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
करने को खड़े नया हाशिया बनाया जा रहा है।
बीच के बचाव में कुछ हाशिया बढ़ाया जा रहा है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
जाड़ो की सर्द रातों में जब ठंड सी लगे।
यादें तेरी घने बादलो से बरसने लगे।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले, कहते थे,
सुपर्णखा,होलिका,सती,निर्भया या प्रियंका वो आज।
पुरुषसत्ता के बदलो मोहरे,फूलन को ही करलो याद।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
फ़ुरसत अब नही मिलती उसे बस एक शिकायत है।
ख्वाबों में आकर मिल ले मेरी बस एक ज़ियारत हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
अपराध रोकने का भरोसा न दे पाए अपने राम जी।
कहानी में ही लिखा पत्नी को जंगल छुड़वाना आम जी।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
चिन्मयानन्दू और सेंगरु बैठे प्रभु से करे फ़रियाद।
यूपी पुलिस को भी ना आ जाए घटनास्थल की याद।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत रंगबाज़ी है, तल्लफ़ुस का बहाना है।
ज़बा हम तो रखते हैं, खौफ़ में पर ज़माना है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
ख़ुदा ना ख़ास्ता गर घर में अंदर आना मुहाल होता।
बहुओं के आने पर बुजुर्गों का ये हाल लाज़िम है।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
उसने जब हाथों को उठा अपने को बचाया था।
हुक़ूमत कहती है कि हाथ क्यूँ उसने पहले उठाया था।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
परेशां होके पन्नो ने कहा जो ज़िल्द के खिलाफ़ी हैं।
ढ़कने की है बस बात ना तू हिस्सा क़िताबी हैं।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सामने झूठ, नीचे-ऊपर झूठ, झूठ बाएं और दाहिने।
जो कुछ बोले साहेब उसके उल्टे समझे जाएं मायने।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
हुक़ूमत ने बग़ावते-ए-आवाम की वजहों को गिना।
हुक़्म दिया कि नाव भी चलेंगी तो पतवार के बिना।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
सड़ी स्मृति को लगा के आग संविधान ने जगाई आस।
क्रोनोलॉजी को समझें ऐसे सभी बराबर ना कोई खास।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
एक जाड़ा,दूजी फ़ुर्सत, फिर144,चौथा इतवार था।
हुजूर, सेंटा तो चला गया, मैं घर बच्चों के साथ था।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
शायरी समझने के लिए कुछ नही बस अक्ल चहिए।
बेअक्ल हैं तो दो तस्वीरों में फर्क की शक्ल चाहिए।।

कल शाम नुक्कड़ पर बुद्ध मिले कहते थे,
कागज़ के टुकड़े पर कैसे मुल्क़ के सपने साकार हो।
मेरे मुल्क़ में हर हक़ मेरा जन्मसिद्ध अधिकार हो।।
30 December 2019


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